छत्तीसगढ़ में इन दिनों चिटफंड की चर्चा बहुत हो रही है। प्रदेश में बीते एक दशक तक करीब 150 चिटफंड कंपनियों ने अपने एजेंटों के जरिए निवेशकों को जमकर चपत लगाई। इन कंपनियों ने करीब 60 हजार करोड़ रुपये के वारे-न्यारे कर दिए। अविभाजित मध्य प्रदेश के समय साल 1993 से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में एक चिटफंड कंपनी काम कर रही है। शुरुआत में तो इस कंपनी ने छोटे-छोटे निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए पैसे जमा कराए और वापस भी कर दिए।
इसके बाद ये कंपनी बड़ी राशि का निवेश कराने लगी और 15 हजार करोड़ रुपये लेकर चंपत हो गई। इसी तरह एक चिटफंड कंपनी अकेले कोरबा से 388 करोड़ रुपये लेकर फरार हो गई। राजधानी के भी करीब एक लाख से ज्यादा लोग भी इस झांसे में आ गए। चिटफंड कंपनियों के जाल में फंसकर भोले-भाले लोग अपने 500 करोड़ रुपये से हाथ धो बैठे हैं। कुल मिलाकर लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई चिटफंड कंपनी के हवाले कर दी।
हाईकोर्ट की एंट्री
इस मसले में हाईकोर्ट की भी एंट्री हुई. जिसके बाद लोगों को लगा की हां अब हमे न्याय मिलेगा। हाईकोर्ट ने चिटफंड कंपनियों की संपत्तियां बेचकर निवेशकों के पैसे लौटाने का आदेश भी दिया था।
छत्तीसगढ़ की राजनीति का हॉट टॉपिक
इस घोटाले में कई नाम उछले। छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम से लेकर चिटफंड कंपनी के ब्रांड अंबेस्डर बने उनके बेटे के हाथ भी इस केस में रंगे दिखे और ये मुद्दा आज भी छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक हॉट टॉपिक है। अब प्रदेश की मौजूदा सरकार ने निवेशकों के इन घाव पर मरहम लगाने का काम किया है। मुख्यमंत्री के आदेश के मुताबिक चिटफंड कंपनियों की संपत्ति कुर्क कर अब लोगों को उनका पैसा लौटाया जा रहा हैं।
कर्ज के तले दबे निवेशक
प्रदेश के लोगों के निवेश से चिटफंड कंपनियां तो मालामाल हो गईं, लेकिन ज्यादा पैसों की लालच में निवेशक कंगाल हो गए। कई निवेशक तो ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी इसमें लगा दी थी। नतीजन जब चिटफंड कंपनियां प्रदेश के लोगों के पैसे लेकर फरार हो गईं तो लोगों को कर्ज का सहारा लेना पड़ा। जिसकी वजह से आज प्रदेश के कई परिवार कर्ज के तले दबे हुए हैं।
सूदखोरी के दलदल में फंसे कई लोग
गांव के कुछ लोगों ने जमीदारों तो किसी ने सूदखोरों से मदद ली। इस सूदखोरी की चपेट में जो भी आया वो इससे बाहर आने की बजाए और फंसता चला गया। सूदखोरी ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें जिसमें आप आसानी से घुस तो सकते हैं, लेकिन बाहर आना मुश्किल है। सूदखोरी को अगर हम एक दलदल भी कहें तो शायद गलत नहीं होगा। क्योंकि इससे जो भी निकलने की कोशिश करता है, उतना ही फंसता चला जाता है। बठेना कांड को लोग अब तक भूले नहीं हैं। इसे सूदखोरी में फंसने का नतीजा ही समझ लीजिए जिसकी वजह से एक पूरा का पूरा परिवार मौत के आगोश में समा गया।
मौजूदा सरकार की पहल
चिटफंड की चीख यहीं पर नहीं रुकी। राजनीतिक गलियारों में भी इसे खूब भुनाया गया। रमन सरकार में हुए इस घोटाले का खामियाजा खुद रमन सिंह को भुगतना पड़ा। कंपनियों में फंसे पैसो को लेने के लिए लोगों को खूब संघर्ष करना पड़ा। कई आंदोलन हुए, पदयात्राएं हुई। अब प्रदेश सरकार इस कोशिश में हैं कि पीड़ितों को जल्द उनकी जमा-पूंजी मिल जाए।
सवाल करने वालों पर भी सवाल बनता है
अब आखिर में सवाल ये है कि इन सबके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए? घोटाले का ये खेल किसकी शह में हुआ? 2003 से लेकर 2018 तक ये कारोबार फलता-फूलता रहा, इसका मतलब क्या इसे किसी का संरक्षण प्राप्त था? जब कंपनियों के एजेंट्स पर एफआईआर दर्ज हो रही थी तब पुलिस क्या कर रही थी? इन सवलों के जवाब जिम्मेदारों को जरूर देने चाहिए।
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