छत्तीसगढ़ की पहली गारमेंट फैक्ट्री खुलने से अब दंतेवाड़ा की तस्वीर बदल रही है। अक्सर जब भी बस्तर की बात की जाती है तो हमारे मन में नक्सलवाद की तस्वीर उभरती है। या यूं कहें कि लोगों के जहन में आज भी बस्तर की तस्वीर वही नक्सल प्रभावित क्षेत्र की ही है। लेकिन बस्तर अब बदलाव की ओर अपने कदम बढ़ा रहा है। छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित जिला दंतेवाड़ा की चर्चा इन दिनों पूरे राज्य में खूब हो रही है। पर इस बार ये चर्चा नक्सलियों की वजह से नहीं हो रही है। इस बार चर्चा का विषय यहां की महिलाएं बनी हैं। इन महिलाओं की मेहनत, लगन और नवाचार सूर्खियां बटोर रहा है। जिले की महिला समूह द्वारा सिले गए कपड़े छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि बेंगलुरु जैसे शहरों में भी धूम मचा रहे हैं। लोग इनके सिले कपड़ों को पसंद भी कर रहे हैं और खरीद भी रहे हैं।
इंसान चाहे तो कुछ भी कर सकता है। महिलाओं के इन प्रयासों ने ‘जहां चाह है वहां राह है’ जैसी कई कहावतों को चरितार्थ किया है। सदियों से नक्सलवाद का दंश झेल रहे दंतेवाड़ा की महिलाओं के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज लोग दंतेवाड़ा को कपड़ो और विकास के लिए जान रहे हैं।
कामयाबी की ओर अग्रसर होता दंतेवाड़ा
डैनेक्स नाम की ये कंपनी जिसका पूरा नाम दंतेवाड़ा नेक्स्ट है, ये महिलाओं को तो आत्मनिर्भर बना ही रही है, साथ ही औरों के लिए भी अपने पैरों पर खड़े होने में मदद कर रही है। इससे महिलाएं आत्मनिर्भर भी हो रही हैं और उनके हाथ के हुनर को भी नई पहचान मिल रही है। ये फैक्ट्री यहां के लोगों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था के लिए भी मील का पत्थर साबित होगी।
दिख रहा डैनेक्स का दम
महिलाओं के इस अभिनव प्रयास में शासन-प्रशासन समेत एनएमडीसी जैसे कई उद्योगिक संस्थान भी साथ दे रहे हैं। इस कंपनी में काम कर रही 300 से 400 महिलाओं का भविष्य भी अब चमकने लगा है। कर्मचारी अब तक करोड़ो के कपड़े बनाकर अपनी किस्मत खुद लिख रहे हैं।
सरकार बनी सफलता की सीढ़ी
दंतेवाड़ा की काजोल बंजारे जैसी कई महिलाएं अपना मुकद्दर खुद बना रही हैं। काजोल डैनेक्स की मैनेजर हैं। वो दंतेवाड़ा की उभरी इस नई तस्वीर की गवाह हैं। ये सब मुमकीन हुआ है सरकार के प्रयासों से। सरकार ही वो सीढ़ी बनी जिस पर चढ़कर यहां की महिलाओं ने विकास की ये गाथा लिखी। महिलाओं का ये हौसला देख मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी खुद को इनकी तारिफ करने से नहीं रोक पाए। सीएम की तारिफ ये बताने के लिए काफी है कि ये महिलाएं वाकई कामयाबी की बुलंदियों को छू रही हैं।
नक्सलगढ़ बन रहा विकासगढ़
बस्तर में न जाने कितनी सारी समस्याएं हैं। लेकिन फिर भी इन तमाम चुनौतियों के बावजूद महिलाओं की ये पहल बेशक काबिल-ए-तारिफ है। हम बस्तर में खेती किसानी की बात करें या उद्योंगो की, छत्तीसगढ़ का ये पिछड़ा कहा जाने वाला हिस्सा अब तरक्की की नई तस्वीर बना रहा है। काजू, इमली, बस्तर की चाय का स्वाद तो सब ले ही चके हैं। अब दंतेवाड़ा में बन रहे ये कपड़े लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जिस तरह से रोजगार व्यवस्था बनाई है उससे उन महिलाओं की स्थिति तो सुधर ही रही है, साथ ही उस इलाके में विलुप्ति की कगार पर खड़े नक्सलवाद के बची कूची परतों को भी उधेड़ रही है।
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