भारत की ऊर्जा नीति में किसी भी बाहरी दबाव का असर नहीं पड़ा है। डोनाल्ड ट्रंप के तीखे बयानों और टैरिफ की धमकी के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि शायद भारत रूस से तेल खरीद को कम कर सकता है, लेकिन सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी आधिकारिक प्रतिबंध या निर्देश उन्हें नहीं मिला है।

रूस न केवल भारत का रणनीतिक साझेदार रहा है, बल्कि उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में भी सहयोगी बना हुआ है। वर्तमान में रूस वैश्विक तेल उत्पादन में 10% से अधिक की हिस्सेदारी रखता है, और भारत उसकी रियायती कीमतों का लाभ उठाकर घरेलू ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए रखने में सफल रहा है।

अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा कोई प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, बल्कि उन्होंने मूल्य सीमा नीति लागू की है। भारत इस सीमा का पालन करते हुए ही तेल आयात कर रहा है। आने वाले समय में यह सीमा 60 डॉलर से घटकर 47.6 डॉलर हो सकती है, लेकिन भारत इसे लेकर स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है।

ट्रंप के यह बयान कि भारत रूस से सैन्य उपकरण और तेल दोनों खरीद रहा है, उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा लगते हैं। लेकिन भारत के लिए प्राथमिकता है – ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों को स्थिर मूल्य पर ईंधन आपूर्ति।

भारत का रुख स्पष्ट है – वैश्विक हितों को देखते हुए वह राजनीति से दूर रहकर आर्थिक दृष्टिकोण अपनाएगा और रूस के साथ ऊर्जा साझेदारी को बनाए रखेगा। यह नीति न केवल देश के लिए बल्कि वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगी।