संघर्ष, आंदोलन और अपूर्ण कार्यकाल: झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अवसान

झारखंड आंदोलन की नींव रखने वाले, आदिवासी जननायक और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन का 4 जुलाई को निधन हो गया। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। पिछले एक महीने से वे किडनी संक्रमण और श्वसन रोग के कारण लाइफ सपोर्ट पर थे।

उनका जीवन उन गिने-चुने नेताओं में शामिल रहा, जिनकी राजनीति संवेदना, संघर्ष और सेवा की नींव पर टिकी रही।

13 साल की उम्र में ही संघर्ष की राह चुनी

शिबू सोरेन का जन्म 1944 में नेमरा गांव (रामगढ़) में हुआ। जब वे सिर्फ 13 साल के थे, महाजनों ने उनके पिता की हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और सूदखोरी के खिलाफ लड़ाई का संकल्प लिया। यही वह मोड़ था, जब उन्होंने जनता के लिए आवाज़ उठानी शुरू की।

JMM की स्थापना और आदिवासी अस्मिता की लड़ाई

1972 में कॉमरेड एके राय और विनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह संगठन जल्द ही झारखंड को बिहार से अलग करने की मांग का प्रतीक बन गया।

लगातार संघर्षों और आंदोलनों के बाद, साल 2000 में झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला। यह शिबू सोरेन के संघर्षों की सबसे बड़ी जीत थी।

मुख्यमंत्री पद की तीन कोशिशें, एक भी कार्यकाल नहीं रहा पूर्ण

  • पहली बार 2005 में सीएम बने, लेकिन 10 दिन में इस्तीफा देना पड़ा।
  • 2008 में दोबारा बने, पर विधायक नहीं होने के कारण उपचुनाव में उतरना पड़ा।
  • 2009 में तमाड़ सीट से चुनाव लड़े और हार गए, कार्यकाल फिर अधूरा रह गया।

तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे कभी राज्य का नेतृत्व स्थायी रूप से नहीं कर पाए।

केंद्रीय राजनीति में भी जगह, लेकिन अस्थायी

यूपीए सरकार में शिबू सोरेन कोयला मंत्री बने, लेकिन विवादों के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। हालांकि, इससे उनकी जनप्रियता और आदिवासी समाज में स्थान कभी कमजोर नहीं हुआ।

दिशोम गुरु के नाम से लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव

शिबू सोरेन को ‘दिशोम गुरुजी’ कहकर पुकारा जाता था। यह नाम उन्हें आदिवासी समाज की सेवा और नेतृत्व के कारण मिला। वे जनसरोकारों से हमेशा जुड़े रहे, चाहे सत्ता में रहें या विपक्ष में।

उनका जीवन राजनीतिक सत्ता से अधिक एक आंदोलन की आवाज था।