महाराष्ट्र सरकार का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने तर्क दिया कि विधानसभा से पारित किसी भी बिल पर मंजूरी देने का अधिकार अदालत का नहीं, बल्कि राज्यपाल और राष्ट्रपति का है। यह शक्तियां संविधान द्वारा प्रदान की गई हैं और न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
हरीश साल्वे का तर्क
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि अनुच्छेद 361 और 200 स्पष्ट रूप से बताते हैं कि राज्यपाल और राष्ट्रपति अपने संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए अदालत के जवाबदेह नहीं होंगे। अदालत इस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती।
संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या
साल्वे ने समझाया कि अनुच्छेद 200 के तहत बिलों की समीक्षा और मंजूरी की कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। कई बार निर्णय जल्दी हो जाता है, जबकि कुछ मामलों में लंबा समय लग सकता है। यह पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
राज्यपाल की शक्ति पर बहस
बहस के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या राज्यपाल की भूमिका को वीटो पावर कहा जा सकता है। साल्वे ने कहा कि इसे वीटो कहना उचित नहीं होगा क्योंकि बिल को वापस भेजना केवल सलाह और पुनर्विचार की प्रक्रिया है। यहां तक कि मनी बिल पर भी राज्यपाल हस्ताक्षर रोक सकते हैं।
अदालत की सीमित भूमिका
सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने यह भी दलील रखी गई कि अदालत यह आदेश नहीं दे सकती कि राज्यपाल या राष्ट्रपति बिल पर
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