नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (MGNREGA) का नाम बदलने की कवायद ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इस फैसले को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं और इसे जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश बताया है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि किसी योजना का नाम बदलना केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होता, बल्कि इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। कार्यालयों, दस्तावेजों और स्टेशनरी में बदलाव पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने पूछा कि इस बदलाव से आम जनता को क्या लाभ मिलेगा?
प्रियंका गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महात्मा गांधी का नाम केवल इतिहास नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। ऐसे में किसी कल्याणकारी योजना से उनका नाम हटाने के पीछे की सोच समझ से परे है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संसद में बहस जनता से जुड़े मूल मुद्दों की बजाय गैर-जरूरी विषयों पर केंद्रित हो रही है, जिससे समय और संसाधनों की बर्बादी हो रही है।
मनरेगा के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने भी कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे महात्मा गांधी के योगदान का अपमान करार दिया। वहीं, वाम दलों ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अधिकार-आधारित रोजगार योजना के मूल ढांचे को कमजोर करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
इधर, दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सरकार की ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) नीति को अपर्याप्त बताया। उनका कहना है कि GRAP केवल संकट के समय सक्रिय होता है, जबकि प्रदूषण की रोकथाम के लिए स्थायी और दीर्घकालिक समाधान जरूरी हैं।
विपक्ष का दावा है कि मनरेगा फंड में कटौती और जिम्मेदारी राज्यों पर डालने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इन तमाम मुद्दों को लेकर आने वाले सत्रों में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है।
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