रायपुर शहर की वर्षों पुरानी स्वच्छता और पर्यावरण से जुड़ी समस्या अब स्थायी समाधान की ओर बढ़ रही है। सरोना डंप-साइट, जो पिछले करीब 20 वर्षों से राजधानी के कचरे का केंद्र रही है, अब वैज्ञानिक और चरणबद्ध बायो-रिमिडिएशन प्रक्रिया के जरिए पूरी तरह बदली जा रही है। गुरुवार को छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री एवं नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री अरुण साव ने साइट का निरीक्षण कर चल रहे कार्यों की प्रगति की समीक्षा की।

निरीक्षण के दौरान उप मुख्यमंत्री ने कचरा निपटान की धीमी रफ्तार पर नाराजगी जताई और संबंधित एजेंसी को स्पष्ट निर्देश दिए कि 31 मार्च 2026 तक परियोजना हर हाल में पूरी की जाए। उन्होंने मशीनरी और मानव संसाधन बढ़ाने के साथ-साथ कार्य में तकनीकी दक्षता लाने पर भी जोर दिया। अरुण साव ने दोहराया कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

तकनीक से होगी कड़ी निगरानी

परियोजना की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए बायो-रिमिडिएशन कार्य की साप्ताहिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इसकी रिपोर्ट उप मुख्यमंत्री कार्यालय, महापौर, राज्य शासन और सूडा को नियमित रूप से भेजी जाएगी। इसके अलावा कार्यों की निगरानी लाइव फीड और ड्रोन कैमरों से की जाएगी, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। रायपुर नगर निगम के अधिकारियों को प्रतिदिन साइट पर भौतिक निरीक्षण करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

हरित क्षेत्र में बदलेगा कचरे का ढेर

निरीक्षण के बाद उप मुख्यमंत्री ने बताया कि सरोना डंप-साइट को पूरी तरह कचरा-मुक्त कर इसे हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। भविष्य में यह स्थल रायपुर के लिए एक मॉडल ग्रीन ज़ोन बनेगा, जिससे पर्यावरण संतुलन बेहतर होगा और शहर की सुंदरता में भी वृद्धि होगी।

करीब 28 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस डंप-साइट पर जमा लगभग 4.5 लाख टन लेगेसी वेस्ट का वैज्ञानिक प्रसंस्करण किया जा रहा है। अब तक 4.30 लाख टन कचरे का बायो-रिमिडिएशन पूरा हो चुका है, जिससे जमीन दोबारा उपयोग योग्य बन गई है। इस प्रक्रिया से आरडीएफ, इनर्ट मटेरियल और बायो-सॉयल जैसे उपयोगी उत्पाद भी प्राप्त हो रहे हैं।

यह परियोजना स्वच्छ भारत मिशन के तहत देशभर में चल रहे लेगेसी वेस्ट रिमिडिएशन अभियानों का अहम हिस्सा है और रायपुर को स्वच्छ, स्वस्थ और हरित शहर बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।