अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापार करने वाले देशों पर कड़ा आर्थिक शिकंजा कसते हुए नया टैरिफ आदेश जारी किया है। इस फैसले के तहत, ईरान से जुड़े देशों को अमेरिका के साथ अपने हर व्यापारिक सौदे पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क देना होगा। यह आदेश तुरंत प्रभाव में आ चुका है।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस फैसले की घोषणा करते हुए साफ किया कि यह निर्णय अंतिम है और इसमें किसी तरह की छूट नहीं दी जाएगी। इस कदम को अमेरिका की ईरान नीति में अब तक की सबसे सख्त आर्थिक कार्रवाई माना जा रहा है।

किन देशों पर मंडराया खतरा?

ईरान के साथ व्यापार करने वाले प्रमुख देशों में भारत, चीन, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, पाकिस्तान और आर्मेनिया शामिल हैं। इन सभी देशों के लिए यह फैसला अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों को और जटिल बना सकता है।

भारत के लिए स्थिति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि अमेरिका पहले से ही भारत पर करीब 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा चुका है। इसमें रूस से ऊर्जा आयात से जुड़ा अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है।

भारत-ईरान व्यापार: कितना है दांव पर?

भारतीय दूतावास के मुताबिक, भारत ईरान को बड़े पैमाने पर खाद्य और औद्योगिक उत्पाद निर्यात करता है। इनमें चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, सिंथेटिक फाइबर, इलेक्ट्रिकल उपकरण और आर्टिफिशियल ज्वेलरी प्रमुख हैं।

वहीं ईरान से भारत को सूखे मेवे, कांच के उत्पाद और विशेष रसायनों का आयात किया जाता है।

ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी (OEC) के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत का ईरान को निर्यात लगभग 1.19 अरब डॉलर रहा, जबकि ईरान से आयात 1.02 अरब डॉलर के करीब था।

DGCI&S के 2025 आंकड़े क्या संकेत देते हैं?

वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय (DGCI&S) के अनुसार, भारत से ईरान को भेजे जाने वाले उत्पादों में अनाज सबसे आगे रहा। इसके अलावा चाय-कॉफी, मसाले, फल-मेवे, औषधीय उत्पाद, आवश्यक तेल, सब्जियां, चीनी, मशीनरी और रसायनों का भी अहम योगदान रहा।

ऐतिहासिक रिश्ते बनाम नई चुनौतियां

भारत और ईरान के संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। भारतीय दूतावास के अनुसार, दोनों देशों के रिश्ते राजनीतिक संवाद, व्यापारिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्क के माध्यम से लगातार मजबूत होते रहे हैं।

चाबहार पोर्ट: रणनीतिक महत्व बरकरार

चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान रणनीतिक साझेदारी की रीढ़ माना जाता है। यह परियोजना भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी कनेक्टिविटी प्रदान करती है।

2015 में समझौता ज्ञापन, 2016 में त्रिपक्षीय करार और 2018 में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) द्वारा संचालन संभालने के बाद, मई 2024 में IPGL और ईरान के पीएमओ के बीच 10 साल का नया अनुबंध हुआ। इससे चाबहार परियोजना को दीर्घकालिक स्थिरता मिली है।

आगे की रणनीति क्या हो सकती है?

ट्रंप का यह टैरिफ फैसला भारत के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि कूटनीतिक चुनौती भी है। आने वाले समय में भारत को अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन बनाए रखते हुए ईरान के साथ अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करनी होगी।