हिरासत में बंद व्यक्तियों के स्वास्थ्य अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की सेहत से जुड़ी शिकायतों पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने उनकी विशेषज्ञ डॉक्टर से मेडिकल जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला उस समय सामने आया है, जब सोनम वांगचुक राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निरुद्ध हैं।

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक की जांच सिर्फ जेल डॉक्टर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि किसी विशेषज्ञ चिकित्सक, विशेष रूप से गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट, से कराई जाए। कोर्ट ने जेल प्रशासन को आदेश दिया है कि जांच के बाद पूरी मेडिकल रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में निर्धारित समय तक अदालत में प्रस्तुत की जाए।

दूषित पानी से बिगड़ी तबीयत का आरोप

सुनवाई के दौरान वांगचुक की पत्नी गितांजलि अंग्मो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक लंबे समय से पेट संबंधी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनका आरोप है कि जेल में उपलब्ध कराया जा रहा दूषित पानी उनकी सेहत पर प्रतिकूल असर डाल रहा है। इसके साथ ही सुरक्षित पेयजल और नियमित स्वास्थ्य जांच की मांग भी की गई।

सरकार का पक्ष

राजस्थान सरकार ने अदालत को बताया कि बीते चार महीनों में 21 बार जेल डॉक्टर द्वारा सोनम वांगचुक की जांच की जा चुकी है। सरकार के अनुसार, उनकी हालिया रिपोर्ट में ब्लड प्रेशर सामान्य पाया गया है और पेट व छाती से जुड़ी कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आई है। साथ ही उन्हें आवश्यक दवाइयां और विटामिन बी-12 भी दिए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य मेडिकल जांच पर्याप्त नहीं है। अदालत ने माना कि वांगचुक की स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञ डॉक्टर की राय अनिवार्य है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि किसी सरकारी अस्पताल के विशेषज्ञ से जांच कराकर रिपोर्ट सौंपी जाएगी।

क्यों हिरासत में हैं सोनम वांगचुक?

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को लद्दाख में छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। इन घटनाओं में चार लोगों की मौत और लगभग 90 लोग घायल हुए थे। सरकार का आरोप है कि वांगचुक ने हिंसा को उकसाया। एनएसए के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।