पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने स्पष्ट कर दिया कि बिना ठोस प्रमाण के किसी भी प्रकार की जांच नहीं कराई जा सकती। अदालत ने कहा कि ‘फिशिंग इंक्वायरी’ की अनुमति देना न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के खिलाफ है।

मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता Menaka Guruswamy ने दावा किया कि West Bengal में फॉर्म-6 के माध्यम से करीब 5 से 7 लाख नए मतदाता जोड़े गए हैं। उनका आरोप था कि यह प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा के बाद पूरी की गई, जो चुनावी नियमों का उल्लंघन हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इतने बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने से चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अगुवाई वाली पीठ ने इन दावों को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि किसी भी जांच के लिए स्पष्ट और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। अदालत ने यह भी दोहराया कि सामान्य आरोपों या मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप संभव नहीं है।

इस विवाद के बीच Election Commission of India की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि फॉर्म-6 का उपयोग नए वोटर जोड़ने या स्थानांतरण के लिए किया जाता है, लेकिन इसकी एक निश्चित समय सीमा होती है। आरोप है कि इस सीमा के बाद भी बड़े पैमाने पर नाम जोड़े गए, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।

अदालत ने अपने पूर्व निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनके मामलों में अपील स्वीकार होने पर ही नाम दोबारा जोड़े जाएं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी को मतदान का अधिकार नहीं मिल सकता। इस संदर्भ में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष दिशा-निर्देश दिए हैं।

गौरतलब है कि राज्य में चुनाव 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में प्रस्तावित हैं, जबकि मतगणना 4 मई को होगी। वहीं Calcutta High Court ने मतदाता सूची से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए 19 ट्रिब्यूनल गठित किए हैं। ऐसे में चुनाव से पहले यह मुद्दा कानूनी और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील बन गया है।