मई 2026 में देश की थोक मूल्य मुद्रास्फीति बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा अप्रैल के मुकाबले काफी अधिक है और बाजार विशेषज्ञों के अनुमान से भी ऊपर रहा। इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन और सप्लाई चेन से जुड़ी लागतों में लगातार दबाव बना हुआ है।
ईंधन और ऊर्जा कीमतों ने बढ़ाया दबाव
महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में आई तेज बढ़ोतरी रही। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ी है। इसी वजह से थोक मूल्य मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
होर्मुज संकट का दिखा असर
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर लगभग हर वस्तु की कीमत पर दिखाई देता है।
खाद्य वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ीं
खाद्यान्न, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खाद्य महंगाई बढ़ने से आम उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो आने वाले महीनों में थोक मूल्य मुद्रास्फीति का असर खुदरा बाजार पर भी अधिक दिखाई दे सकता है।
आम जनता पर क्या होगा प्रभाव?
थोक स्तर पर कीमतें बढ़ने का सीधा असर कुछ समय बाद खुदरा बाजार में देखने को मिलता है। यदि कंपनियों की लागत बढ़ती है तो वे उत्पादों के दाम बढ़ाकर इसकी भरपाई करती हैं। ऐसे में खाद्य सामग्री, उपभोक्ता वस्तुओं और परिवहन सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि थोक मूल्य मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़ों पर आर्थिक विशेषज्ञ नजर बनाए हुए हैं।
आरबीआई और सरकार की चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक पहले ही चालू वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान बढ़ा चुका है। यदि आने वाले महीनों में ईंधन और खाद्य कीमतों में राहत नहीं मिलती, तो महंगाई नियंत्रण सरकार और आरबीआई दोनों के लिए चुनौती बन सकती है। लगातार बढ़ती थोक मूल्य मुद्रास्फीति आर्थिक नीतियों को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता और मौसम संबंधी जोखिम महंगाई को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति अभी नियंत्रण में है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों पर नजर रखना जरूरी होगा।
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