विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA नियम एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गए हैं। अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद इस मुद्दे ने नया राजनीतिक रंग ले लिया है। सरकार का कहना है कि नए प्रावधान केवल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए लाए गए हैं। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इससे कुछ संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है। फिलहाल संशोधन विधेयक संसद में विचाराधीन है, जबकि नए नियम लागू हो चुके हैं।
मुख्य अपडेट
- संसद में संशोधन विधेयक पर चर्चा जारी है।
- नए FCRA नियम जून 2026 से लागू हैं।
- सरकार ने पारदर्शिता को मुख्य उद्देश्य बताया।
- विपक्ष ने धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर असर की आशंका जताई।
- विदेशी फंडिंग की रिपोर्टिंग पहले से अधिक विस्तृत होगी।
FCRA नियम क्या हैं और इनका उद्देश्य क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA भारत में विदेशी फंड प्राप्त करने और उसके उपयोग को नियंत्रित करता है। यह कानून एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक संगठनों और अन्य पात्र संस्थाओं पर लागू होता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग केवल घोषित कार्यों में हो। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा भी बनी रहे।
FCRA नियम में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव
सरकार ने कानून में कई प्रशासनिक सुधार प्रस्तावित किए हैं।
- पंजीकरण समाप्त होने पर विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के लिए नामित प्राधिकारी नियुक्त होगा।
- धार्मिक स्थलों की मूल पहचान सुरक्षित रखने का स्पष्ट प्रावधान जोड़ा गया है।
- संबंधित संस्थाओं को पुनर्विचार और जिला न्यायालय में अपील का अधिकार मिलेगा।
- समय पर नवीनीकरण नहीं होने पर पंजीकरण स्वतः समाप्त माना जाएगा।
- कुछ उल्लंघनों में अधिकतम सजा पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है।
- राज्य एजेंसियों को जांच शुरू करने से पहले केंद्र की अनुमति लेनी होगी।
लागू हो चुके नए FCRA नियम में क्या बदला?
नए नियमों के तहत प्रत्येक संस्था को विदेशी अंशदान का उद्देश्य स्पष्ट बताना होगा। इसके साथ ही कार्यक्षेत्र वाले राज्यों की जानकारी देना भी अनिवार्य होगा।
वार्षिक रिपोर्ट में अब परियोजना आधारित खर्च का पूरा विवरण देना होगा। वेबसाइट और सोशल मीडिया खातों की जानकारी भी साझा करनी होगी। यदि धन किसी मध्यस्थ संस्था से मिला है, तब भी अंतिम विदेशी दानदाता का विवरण देना आवश्यक होगा।
इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वर्षों में न्यूनतम 10 लाख रुपये के विदेशी अंशदान के उपयोग का प्रमाण देना होगा।
सरकार और विपक्ष के तर्क
सरकार का कहना है कि FCRA नियम का मूल उद्देश्य नहीं बदला है। केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाया गया है।
वहीं विपक्ष का आरोप है कि कुछ नए प्रावधानों से केंद्र सरकार की शक्तियां बढ़ सकती हैं। विपक्ष का कहना है कि इससे धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार इन आशंकाओं को निराधार बता रही है।
एक नजर में प्रमुख आंकड़े
- वर्ष 2024-25 में लगभग 16,200 सक्रिय संस्थाओं को विदेशी अंशदान मिला।
- विदेशी फंडिंग की कुल राशि करीब 22,963 करोड़ रुपये रही।
- पिछले दस वर्षों में लगभग 22,000 एफसीआरए पंजीकरण रद्द हुए।
- लगभग 15,000 पंजीकरण समय पूरा होने के बाद समाप्त हुए।
- प्रशासनिक खर्च की अधिकतम सीमा 20 प्रतिशत निर्धारित है।
क्या है आगे की स्थिति?
संशोधन विधेयक अभी संसद में विचाराधीन है। इसलिए अंतिम कानूनी स्वरूप संसद की मंजूरी के बाद ही तय होगा। हालांकि लागू किए गए नए नियमों का पालन सभी पंजीकृत संस्थाओं को करना होगा। आने वाले समय में संसद की चर्चा इस कानून की दिशा तय करेगी।
यह भी पढ़ें:जनसेवा और सुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दें : मुख्यमंत्री साय
