आजकल स्कूल जाने वाले बहुत से बच्चों की आंखों पर चश्मा चढ़ता दिख रहा है. पहले जो समस्या टीनएज या बड़ी उम्र में दिखती थी, अब वह 6-7 साल के बच्चों में भी सामने आने लगी है. डॉक्टर इसे “मायोपिया” यानी नियरसाइटेडनेस कहते हैं, जिसमें बच्चे को दूर की चीजें धुंधली दिखती हैं. Chashme Se Suraksha Niyam को लेकर पीडियाट्रिशियन और आई डॉक्टर अब पहले से ज्यादा सतर्क सलाह दे रहे हैं.
बच्चों की नजर और मायोपिया से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
कम उम्र में बच्चों को चश्मा लगने से पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन कुछ आदतों से खतरा काफी कम किया जा सकता है. रोजाना धूप में खेलने का समय बढ़ाना, स्क्रीन टाइम घटाना, पढ़ाई के दौरान सही दूरी और रोशनी रखना, बीच-बीच में आंखों को आराम देना और समय पर आंखों की जांच कराना – ये पांच आदतें डॉक्टरों की सबसे ज्यादा सुझाई गई ट्रिक्स हैं.
जरूरी बातें
- बच्चों में मायोपिया के मामले दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे हैं.
- रोजाना बाहर धूप में समय बिताना सबसे असरदार उपाय माना गया है.
- स्क्रीन टाइम और लगातार पास से पढ़ना जोखिम बढ़ा सकता है.
- एक बार चश्मा लग जाए तो नजर पूरी तरह वापस नहीं होती, सिर्फ बढ़ना रोका जा सकता है.
- लक्षण दिखते ही आई डॉक्टर से जांच जरूरी है.
बच्चों में कम उम्र में चश्मा क्यों लग रहा है?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार, अमेरिका में 6 से 19 साल के करीब 40% बच्चे नियरसाइटेड यानी मायोपिक पाए गए हैं, और एशिया में यह दर लगभग दोगुनी है | डॉक्टरों का कहना है कि अगर यही रफ्तार रही तो 2050 तक दुनिया की आधी आबादी को नजर की समस्या हो सकती है.
मायोपिया तब होता है जब आंख की बनावट सामान्य से थोड़ी लंबी हो जाती है, जिससे पास की चीजें साफ दिखती हैं लेकिन दूर की धुंधली . गौरतलब है कि यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, इसलिए शुरुआत में माता-पिता को पता ही नहीं चलता|
Chashme Se Suraksha Niyam: 5 आसान ट्रिक्स
चश्मे से सुरक्षा के कुछ जरूरी नियम
पीडियाट्रिशियन और आई डॉक्टर बार-बार जिन आदतों की सलाह देते हैं, वे मुश्किल नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल की जा सकने वाली हैं.
1. रोजाना धूप में खेलने का समय बढ़ाएं
डॉक्टरों की सबसे बड़ी सलाह यही है कि बच्चा जितना समय बाहर धूप में बिताए, उतना बेहतर. एक पीडियाट्रिक ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट हर मरीज को यही सलाह देती हैं कि बच्चे को ज्यादा समय बाहर बिताना चाहिए, क्योंकि धूप ही मायोपिया रोकने का सबसे कारगर तरीका है. वे रोजाना कम से कम एक से दो घंटे बाहर खेलने और स्क्रीन टाइम को भी एक से दो घंटे तक सीमित रखने की सलाह देती हैं
इसके अलावा, कुछ नई रिसर्च बताती हैं कि रोजाना करीब 80 मिनट या उससे ज्यादा बाहर बिताना मायोपिया शुरू होने और बढ़ने दोनों को कम करने में सबसे असरदार उपाय माना जा रहा है. हालांकि, दोपहर की तेज धूप में बच्चे को टोपी और धूप के चश्मे के साथ बाहर भेजना बेहतर रहता है.
2. स्क्रीन टाइम पर लगाम लगाएं
आजकल मोबाइल, टैबलेट और टीवी बच्चों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं. लगातार पास से स्क्रीन देखना आंखों पर दबाव डालता है. अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की सलाह है कि 2 से 5 साल के बच्चों का स्क्रीन टाइम रोजाना एक घंटे से ज्यादा न हो, और छोटे बच्चों को स्क्रीन की जगह बिना डिजिटल खेल में समय देना चाहिए स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम को आउटडोर एक्टिविटी और शारीरिक खेल के साथ संतुलित रखना जरूरी बताया गया है.
3. पढ़ाई और स्क्रीन के दौरान सही दूरी और रोशनी रखें
केवल समय ही नहीं, बल्कि किताब या स्क्रीन कितनी पास है, यह भी मायने रखता है. डॉक्टर मोबाइल या टैबलेट जैसे हैंडहेल्ड डिवाइस को आंखों से करीब 16 से 24 इंच की दूरी पर रखने की सलाह देते हैं . वहीं, पढ़ाई करते समय कमरे में पर्याप्त रोशनी होना भी जरूरी है, ताकि आंखों पर अतिरिक्त जोर न पड़े.
4. बीच-बीच में आंखों को आराम दें – 20/20/2 नियम अपनाएं
लगातार पास की चीज पर नजर टिकाए रखना आंखों की मांसपेशियों को थका देता है. इसके लिए डॉक्टर एक आसान तरीका बताते हैं – हर 20 मिनट बाद, करीब 20 फीट दूर किसी चीज को 2 मिनट तक देखें. इसे 20/20/2 नियम कहा जाता है. साथ ही, ऑनलाइन क्लास या होमवर्क के बीच थोड़ी देर उठकर टहलना या स्ट्रेच करना भी आंखों को राहत देता है|
5. समय पर आंखों की जांच कराएं
बच्चे अक्सर खुद नहीं बता पाते कि उन्हें कम दिखने लगा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि सबको वैसा ही दिखता है. इसलिए माता-पिता को कुछ संकेतों पर ध्यान देना चाहिए – जैसे बच्चे का टीवी के बहुत पास बैठना, आंखें सिकोड़कर देखना, स्कूल में ब्लैकबोर्ड पढ़ने में दिक्कत होना या बार-बार सिरदर्द की शिकायत करना. ऐसे में तुरंत आई डॉक्टर से जांच करानी चाहिएवहीं, हल्के लक्षण न भी दिखें तो भी नियमित जांच जरूरी मानी जाती है.
अगर बच्चे को पहले से चश्मा लग चुका है तो?
अगर जांच में मायोपिया की पुष्टि हो जाए, तो घबराने की जरूरत नहीं. डॉक्टर बताते हैं कि एक बार मायोपिया होने के बाद नजर पूरी तरह वापस सामान्य नहीं होती, लेकिन सही चश्मे, आउटडोर एक्टिविटी और मायोपिया कंट्रोल तरीकों से इसे बढ़ने से रोका जा सकता है कुछ मामलों में डॉक्टर कम मात्रा में एट्रोपिन आई ड्रॉप्स की भी सलाह देते हैं, जिन्हें बच्चों में मायोपिया बढ़ने की रफ्तार धीमी करने में मददगार माना गया है. यह फैसला और खुराक पूरी तरह डॉक्टर की सलाह पर ही निर्भर करना चाहिए.
रोजमर्रा की जिंदगी में ये आदतें कैसे शामिल करें?
व्यस्त दिनचर्या में यह पांचों आदतें एक साथ अपनाना मुश्किल लग सकता है, लेकिन छोटे-छोटे बदलाव से शुरुआत की जा सकती है. स्कूल से लौटने के बाद होमवर्क शुरू करने से पहले बच्चे को आधा घंटा बाहर खेलने दें. वहीं, वीकेंड पर पार्क या मैदान में परिवार के साथ समय बिताना भी आदत बनाने में मदद करता है. इसके अलावा, टीवी या मोबाइल देखने का एक तय समय तय करें, ताकि बच्चा बिना रोक-टोक स्क्रीन पर न बैठा रहे. साथ ही, पढ़ाई की टेबल और कुर्सी की ऊंचाई सही रखें, ताकि किताब आंखों से उचित दूरी पर रहे.
गौरतलब है कि यह सिर्फ बच्चे की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आदत बन जाए तो असर ज्यादा दिखता है. अगर माता-पिता खुद भी मोबाइल कम इस्तेमाल करें और बाहर समय बिताएं, तो बच्चे उसे स्वाभाविक रूप से अपनाते हैं. नतीजतन, यह न सिर्फ आंखों बल्कि बच्चे के मूड और नींद के लिए भी फायदेमंद साबित होता है.
स्कूल और शिक्षकों की भूमिका
घर के अलावा स्कूल में भी बच्चों की आंखों का ध्यान रखा जा सकता है. क्लास में बच्चे को ब्लैकबोर्ड से बहुत पास या बहुत दूर न बैठाया जाए. वहीं, लंबे पीरियड के बीच छोटे ब्रेक में बच्चों को आंखें बंद करने या दूर देखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. कुछ स्कूल अब असेंबली या स्पोर्ट्स पीरियड को प्राथमिकता देकर आउटडोर समय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जो एक अच्छा कदम माना जाता है.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या मायोपिया को पूरी तरह रोका जा सकता है? पूरी तरह रोकना मुश्किल है, लेकिन आउटडोर टाइम बढ़ाकर और स्क्रीन टाइम घटाकर खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.
बच्चे को दिनभर में कितना बाहर समय बिताना चाहिए? डॉक्टर आमतौर पर रोजाना एक से दो घंटे धूप में खेलने की सलाह देते हैं.
क्या चश्मा लगने के बाद नंबर कम हो सकता है? आमतौर पर नहीं, लेकिन सही देखभाल से नंबर बढ़ने की रफ्तार धीमी की जा सकती है.
कौन से लक्षण दिखते ही डॉक्टर के पास जाना चाहिए? आंखें सिकोड़ना, टीवी के पास बैठना, बार-बार सिरदर्द या ब्लैकबोर्ड पढ़ने में दिक्कत होने पर तुरंत जांच कराएं.
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। बच्चे की आंखों से जुड़ी किसी भी समस्या, इलाज या चश्मे के नंबर से जुड़े फैसले से पहले योग्य पीडियाट्रिशियन या आई डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
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