पिछले कुछ वर्षों में देश और दुनिया में महिलाओं की प्रजनन क्षमता यानी फर्टिलिटी घटने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. डॉक्टरों के पास देर से गर्भधारण की कोशिश करने वाले कपल्स की संख्या बढ़ रही है. कई महिलाओं को प्राकृतिक रूप से मां बनने में दिक्कत हो रही है.
also, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के शहरी इलाकों में भी यह चिंता अब आम होती जा रही है. यहां शादी की उम्र बढ़ने के साथ-साथ करियर और लाइफस्टाइल से जुड़े दबाव भी बढ़े हैं.
फर्टिलिटी घटने की मुख्य वजह क्या है
महिलाओं में फर्टिलिटी घटने के पीछे कोई एक कारण नहीं है. उम्र के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता में स्वाभाविक कमी, moreover, PCOS और एंडोमेट्रियोसिस जैसी बीमारियां, मोटापा, धूम्रपान, बढ़ता तनाव और देर से शादी-प्रेगनेंसी की योजना, ये सभी मिलकर प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हैं. सही समय पर जांच और लाइफस्टाइल में सुधार से इसमें काफी हद तक मदद मिल सकती है.
महिलाओं में फर्टिलिटी कम होने के कारण:
- उम्र बढ़ने के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता स्वाभाविक रूप से घटती है, खासकर 32 साल के बाद
- PCOS भारतीय महिलाओं में बांझपन का एक प्रमुख कारण है और अक्सर मोटापे से जुड़ा होता है
- तनाव हार्मोनल असंतुलन बढ़ाकर PCOS और बांझपन की संभावना बढ़ा सकता है
- धूम्रपान अंडों की गुणवत्ता और मेनोपॉज़ की उम्र, दोनों को प्रभावित कर सकता है
- समय पर जांच और लाइफस्टाइल सुधार से जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है
फर्टिलिटी घटना: बड़ी तस्वीर
अमेरिकन सोसाइटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (ASRM) की पत्रिका Fertility and Sterility में दिसंबर 2025 में प्रकाशित एक शोध शृंखला के अनुसार, पिछले 50 सालों में दुनियाभर में जन्म दर में भारी गिरावट आई है. शोधकर्ताओं ने इसके पीछे सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक कारणों को जिम्मेदार बताया है.
अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के आंकड़ों के मुताबिक, वहां प्रति महिला औसत बच्चों की संख्या घटकर 1.6 रह गई है, जो जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 के आंकड़े से काफी कम है. however, यह डेटा अमेरिका का है, लेकिन भारत सहित कई देशों में भी जन्म दर में गिरावट का यही रुझान देखा जा रहा है.
उम्र: फर्टिलिटी घटने की सबसे बड़ी प्राकृतिक वजह
अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स (ACOG) के नवंबर 2025 के क्लिनिकल गाइडेंस के मुताबिक, महिलाओं में अंडों (oocytes) की सबसे ज्यादा संख्या गर्भ में ही, करीब 20वें हफ्ते में होती है. इसके बाद यह संख्या लगातार घटती जाती है.
32 साल की उम्र के बाद यह कमी तेज हो जाती है और 37 साल के बाद और भी तेजी से घटती है. इसका मतलब है कि उम्र बढ़ने के साथ न सिर्फ अंडों की संख्या कम होती है, बल्कि उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है.
ACOG की सलाह है कि अगर कोई कपल नियमित रूप से बिना गर्भनिरोधक के कोशिश कर रहा है और फिर भी गर्भधारण नहीं हो रहा, तो उसे समय पर प्रजनन विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, खासकर जब महिला की उम्र ज्यादा हो.
PCOS और मोटापा: भारतीय महिलाओं में बढ़ती समस्या
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अंतर्गत नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव हेल्थ में हुए शोध बताते हैं कि पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) भारतीय महिलाओं में बांझपन का एक प्रमुख कारण है. Also, इसी शोध में यह भी सामने आया कि PCOS से जूझ रही करीब 30 से 70 प्रतिशत महिलाओं में मोटापा भी मौजूद रहता है, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाकर स्थिति को और जटिल बना देता है.
एक अन्य ICMR अध्ययन में यह भी पाया गया कि तनाव और PCOS के बीच सीधा संबंध है. तनाव के कारण महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन बढ़ता है, जिससे PCOS के लक्षण और बांझपन की संभावना दोनों बढ़ सकती हैं.
अन्य प्रमुख कारण
फर्टिलिटी को प्रभावित करने वाले कुछ और आम कारण इस प्रकार हैं:
- एंडोमेट्रियोसिस: टिशू गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती है, जिससे अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब प्रभावित हो सकते हैं.
- धूम्रपान: अमेरिका के एक बड़े अध्ययन (Women’s Health Initiative) में धूम्रपान को बांझपन और जल्दी मेनोपॉज़ से जोड़ा गया है.
- देर से शादी और परिवार नियोजन: करियर की वजह से गर्भधारण की योजना पीछे खिसकना, जिससे उम्र से जुड़ी फर्टिलिटी कमी का असर पड़ता है.
- पर्यावरणीय कारक: माइक्रोप्लास्टिक और कुछ रसायनों के संपर्क को भी अंडाशय की क्षमता पर असर डालने वाला बताया गया है, however, इस विषय पर शोध अभी जारी है.
बचाव और सावधानी के व्यावहारिक उपाय
फर्टिलिटी को पूरी तरह गारंटी के साथ बचाया नहीं जा सकता, लेकिन डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक कुछ कदम जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं:
- समय पर जांच कराएं: अगर परिवार में जल्दी मेनोपॉज़ या PCOS का इतिहास है, तो 25-30 की उम्र में ही स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लें.
- वजन नियंत्रित रखें: संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि से इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल असंतुलन कम किया जा सकता है.
- तनाव प्रबंधन: योग, पर्याप्त नींद और काम-जीवन संतुलन तनाव-जनित हार्मोनल बदलाव को कम कर सकते हैं.
- धूम्रपान और शराब से दूरी: ये आदतें अंडों की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
- परिवार नियोजन पर समय रहते सोचें: अगर बच्चा देर से प्लान करना है, तो एक बार फर्टिलिटी विशेषज्ञ से अंडाशय की क्षमता (ovarian reserve) की जांच के विकल्पों पर बात जरूर करें.
- एक साल तक कोशिश के बाद भी गर्भधारण न हो तो देर न करें: 35 साल से कम उम्र में एक साल और 35 से ज्यादा उम्र में छह महीने की कोशिश के बाद भी गर्भधारण न हो तो डॉक्टर से मिलें.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फर्टिलिटी टेस्ट किस उम्र में करानी चाहिए? अगर पारिवारिक इतिहास या मासिक धर्म से जुड़ी अनियमितता है, तो 25-30 की उम्र में ही जांच शुरू कराई जा सकती है. सामान्य स्थिति में, गर्भधारण की कोशिश शुरू करने से पहले या एक साल कोशिश के बाद भी सफलता न मिलने पर जांच कराने की सलाह दी जाती है.
क्या तनाव कम करने से फर्टिलिटी सुधर सकती है? शोध बताते हैं कि तनाव हार्मोनल असंतुलन बढ़ा सकता है, खासकर PCOS से जूझ रही महिलाओं में. हालांकि, तनाव प्रबंधन अकेले सभी तरह की बांझपन की समस्या ठीक नहीं करता, यह समग्र इलाज का एक हिस्सा हो सकता है.
क्या मोटापा कम करने से फर्टिलिटी पर असर ? so, हां, कई अध्ययनों में वजन घटाने से हार्मोनल संतुलन और ओव्यूलेशन में सुधार देखा गया है. But यह असर हर महिला में अलग हो सकता है.
डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें. किसी बीमारी, दवा, डाइट या व्यायाम में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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