इमरजेंसी के दौर की राजनीतिक उथल-पुथल को एक सस्पेंस थ्रिलर के सांचे में ढालने की कोशिश करती फिल्म “डायल 1975” इस हफ्ते ओटीटी पर रिलीज़ हुई है। नवनीत बहल और विभु कश्यप के निर्देशन में बनी यह फिल्म के के मेनन के दमदार अभिनय के लिए चर्चा में है, लेकिन उलझी हुई पटकथा की वजह से आलोचकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है।
डायल 1975 मूवी रिव्यू का निचोड़ एक नजर में
डायल 1975 एक दिलचस्प विचार से शुरू होती है, लेकिन ओवरस्टफ्ड स्क्रीनप्ले और अधूरे किरदारों की वजह से अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाती। के के मेनन का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, जबकि कहानी का जटिल जाल दर्शकों को उलझाए रखता है।
कहानी और सेटिंग
फिल्म की कहानी भारत के इमरजेंसी काल में एक गुप्त वायरलेस फोन के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो असली इतिहास को काल्पनिक थ्रिलर तत्वों के साथ जोड़ती है। यह मिश्रण फिल्म को अन्य पीरियड ड्रामा से अलग पहचान देता है, और इमरजेंसी के दौर के डर और अनिश्चितता के माहौल को पर्दे पर उतारने में निर्देशक जोड़ी काफी हद तक सफल रही है।
अभिनय और निर्देशन कैसा रहा
के के मेनन ने अपने किरदार को नैतिक रूप से जटिल और अप्रत्याशित बनाकर फिल्म की जान बना दिया है। उनका अभिनय इतना दमदार है कि वे एक मुश्किल किरदार को भी दर्शकों के लिए दिलचस्प बना पाते हैं। हालांकि निर्देशन के स्तर पर फिल्म बार-बार मुख्य कहानी से भटककर उपकथाओं (subplots) के जाल में उलझ जाती है, जिससे दर्शकों को आगे क्या होगा इसकी उत्सुकता से ज्यादा प्लॉट को समझने में मेहनत करनी पड़ती है।
कमजोर कड़ियां कहां रह गईं
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी उलझी हुई पटकथा है। कई किरदार अधूरे रह जाते हैं और उनकी पृष्ठभूमि ठीक से स्थापित नहीं हो पाती। सस्पेंस बनाए रखने की कोशिश में कहानी इतनी शाखाओं में बंट जाती है कि तनाव और रोमांच का असर कमजोर पड़ जाता है, जो एक थ्रिलर के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है।
सपोर्टिंग कास्ट और तकनीकी पक्ष कैसा रहा
के के मेनन के अलावा फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट ने भी अपने-अपने किरदारों में ठीक-ठाक काम किया है, हालांकि उन्हें पर्याप्त स्क्रीन टाइम और गहराई नहीं मिल पाई। सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिज़ाइन 1970 के दशक के माहौल को दमदार तरीके से पर्दे पर उतारते हैं, जिससे दर्शकों को उस दौर में वापस जाने जैसा एहसास होता है। बैकग्राउंड स्कोर तनाव बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन एडिटिंग के स्तर पर फिल्म को थोड़ा और कसा जा सकता था, खासकर दूसरे हाफ में जहां कहानी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रिया
फिल्म के रिलीज़ होने के बाद से आलोचकों की राय बंटी हुई नजर आ रही है। कई समीक्षकों ने के के मेनन के अभिनय और फिल्म के अनोखे विचार की सराहना की है, वहीं कुछ ने पटकथा की उलझन को फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बताया है। सोशल मीडिया पर भी दर्शकों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही, जहां कुछ लोगों ने फिल्म के ऐतिहासिक संदर्भ को सराहा तो कुछ ने इसे बीच में उलझा हुआ बताया।
क्या यह फिल्म देखने लायक है
अगर आप के के मेनन के फैन हैं या इमरजेंसी के दौर की राजनीतिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रुचि रखते हैं, तो डायल 1975 एक बार देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप एक कसी हुई, सीधी थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म की उलझी हुई संरचना आपको निराश कर सकती है। समीक्षकों ने इसे औसत से थोड़ी बेहतर रेटिंग दी है, जो दर्शाता है कि फिल्म का विचार शानदार है लेकिन उसका क्रियान्वयन कमजोर रह गया।
इमरजेंसी काल की फिल्मों में इसकी जगह कहां बनती है
हाल के वर्षों में इमरजेंसी और उससे जुड़े दौर पर आधारित कई फिल्में और सीरीज़ बन चुकी हैं, लेकिन डायल 1975 इस विषय को एक गुप्त तकनीकी उपकरण के इर्द-गिर्द बुनकर थोड़ा अलग प्रयोग करती है। यह प्रयोग भले ही पूरी तरह सफल न हो पाया हो, लेकिन इतिहास और थ्रिलर को मिलाने का यह तरीका आने वाले फिल्मकारों के लिए एक दिलचस्प संदर्भ बन सकता है। जो दर्शक भारतीय राजनीतिक इतिहास में गहरी रुचि रखते हैं, उनके लिए फिल्म का विषय खुद में ही आकर्षण का कारण बन जाता है।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर पर एक नजर
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इमरजेंसी काल के तनावपूर्ण माहौल को बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहा है। हालांकि गानों के मामले में फिल्म ज्यादा प्रयोग नहीं करती, क्योंकि यह मूलतः एक सस्पेंस-ड्रामा है जहां संगीत की भूमिका माहौल बनाने तक सीमित रखी गई है। यह दृष्टिकोण फिल्म की गंभीरता को बनाए रखने में मदद करता है, भले ही इससे फिल्म का मनोरंजन पक्ष थोड़ा कम हो जाता है।
अस्वीकरण: यह रिव्यू लेखक की व्यक्तिगत राय और उपलब्ध समीक्षाओं पर आधारित है। फिल्म देखने का अनुभव हर दर्शक के लिए अलग हो सकता है।
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