प्रदेश की आबादी 3 करोड़ से अधिक, 1.99 करोड़ का टीकाकरण

रायपुर। टीके का नाम आते ही एक विश्वास का भाव पैदा होने लगता है। यह टीका भले ही मासूम के चेहरे के किसी हिस्से में लगने वाला काजल का टीका हो या फिर किसी संक्रामक बीमारी से बचने के लिए हो। पुरातन समय से चली आ रही धारणा आज भी प्रचलन में है कि मां अपने मासूम बच्चों को किसी के नजर से बचाने टीका लगाती है। यह धारणाओं और परम्पराओं पर आधारित है, इसलिए इसे लगाने के बाद विश्वास कायम हो, डर-भय समाप्त हो जाए यह शायद ही संभव है। यदि ऐसा होता तो निश्चित ही कोई बच्चों को संक्रामक बीमारी से बचाने के लिए अस्पताल में टीकाकरण नहीं कराता। जागरूकता के साथ ही बच्चों में टीकाकरण का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। टीकाकरण बच्चे के रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाता है और उन्हें विभिन्न जीवाणु तथा विषाणुओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

यह सत्य है कि टीका या वैक्सीन वैज्ञानिकों, चिकित्सकों द्वारा जांची और परखी गयी वह खोज है, जो हमें संक्रामक बीमारी से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। हम सभी को मालूम है कि कोविड-19 को एक संक्रामक रोग घोषित किया गया है। चिकित्सा वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है कि को-वैक्सीन और कोविशील्ड का टीका लोगों को लगाया जा रहा है। यह वैक्सीन कोरोना के संक्रमण से बचने में प्रभावी हो रही हैं। इसलिए कोरोना की रोकथाम के लिए टीकाकरण का अभियान पूरे देश में जोर-शोर से जारी है। प्रदेश की लगभग 3 करोड़ की आबादी में से लगभग 1 करोड़ 99 लाख लोगों ने वैक्सीनेशन का डोज लिया है।

वैक्सीन संक्रमण से बचने का उपाय

वैक्सीन के उत्पादन तथा उपलब्धता के अनुसार शतप्रतिशत टीकाकरण का कार्य लंबे समय तक जारी रहेगा। कोरोना की पहली और दूसरी लहर में हमें अपनों से लेकर कई लोग जो कोरोना की जंग हार गए तथा ऐसे लोग जो कोरोना से लड़ते हुए जंग जीत गए, इन दोनों से मिली सीख को हमें जीवन में उतारना चाहिए। अब तीसरी लहर की सुगबुगाहट के बीच हम उससे कैसे अपने आपको और अपने परिवार को इससे बचा सकें इस बारे हमें सोचना चाहिए। बहुत लोगों की धारणा है कि एक बार टीका लगने के बाद हम कोरोना से आसानी से लड़ सकते हैं, टीका लगने के बाद कोरोना का वायरस हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस संबंध में चिकित्सा विशेषज्ञों की राय, अपील, पढ़ने, जानने समझने के बाद इतना तो कहा जा सकता है कि टीका हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। हमें बीमारी से लडऩे में सहायता करता है। कोरोना संक्रमितों के सम्पर्क में आने के बाद हम संक्रमित होते भी हैं तो हमारी स्थिति उतनी गंभीर नहीं होती, जितनी बिना वैक्सीन वाले संक्रमितों की होती है।

बदले जीवन जीने का तरीका

वैक्सीन लगने के बाद आप संक्रमित न हो इसकी कोई ठोस गारंटी नहीं है। ऐसे में हमें टीका लगवाने के साथ अपने जीवन जीने का तरीका बदलने की आवश्यकता है। कोरोना की पहली लहर खत्म होने के बाद शायद हम उतने सतर्क और सावधान नहीं हुए, पहली लहर में हमने सीखा था कि मास्क पहनना है। हाथ लगातार धोना है। खान-पान पर ध्यान देना है। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करना है। लेकिन दुर्भाग्यवश पहली लहर का असर कम होने के साथ हम सभी के भीतर से कोरोना का भय मिटता चला गया और हमारी लापरवाही जारी रही। इसलिए दूसरी लहर सभी के लिए चुनौतियों के साथ पीड़ादायक रही। कोरोना की पहली लहर ने जहां हमें बहुत कुछ सिखाने का काम किया है वहीं दूसरी लहर ने हमें अपनी गल्तियों और लापरवाही का अहसास कराते हुए फिर से कठिन चुनौतियों से लडऩे के लिए तैयार किया है। यदि हम कोरोना की पहली लहर में बनी आदतों और दूसरी लहर में हुई गल्तियों से सीख लेकर जीवन का तरीका बदल लेंगे और टीका लगवाएंगे तो निश्चित ही कोरोना की आने वाली तीसरी लहर हमारा ज्यादा कुछ नुकसान नहीं कर पाएगी।

प्रदेश में अब तक 1.99 करोड़ को लगी वैक्सीन

छत्तीसगढ़ में अब तक 1 करोड़ 99 लाख लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। पहला डोज 1 करोड़ 41 लाख 18 हजार से अधिक ओर 57 लाख 55 हजार लोगों ने दोनों डोज लगवा लिया है। फ्रंट लाईन वर्करों में 3 लाख 81 हजार से अधिक लोगों को चिन्हित किया गया था। इनमें से शत प्रतिशत लोगों ने पहला डोज लगवा लिया है। वहीं 80 प्रतिशत लोगों ने ही दूसरा डोज लगवाया है। हेल्थ वर्कर की बात करें तो 3 लाख 39 हजार लोगों में से 91 प्रतिशत लोगों ने पहला डोज और 85 प्रतिशत ने दूसरा डोज लगवाया है। वहीं 60 से अधिक उम्र के 69 लाख 57 हजार लोगों में से 84 प्रतिशत लोगों पहला डोज और 52 प्रतिशत लोगों ने दूसरा डोज लगवा लिया है। 18 से 44 वर्ष के लोगों की संख्या प्रदेश में 1 करोड़ 26 लाख 94 हजार है, इनमें से 60 प्रतिशत ने पहला और 29 प्रतिशत लोगों ने दोनों डोज लगवा लिया हे। प्रदेश में वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार टीकाकरण का कार्य चल रहा है।