सरकार ने कई छोटी-बड़ी योजनाएं वहां रहने वालों के लिए लागू की
रायपुर। पिछले दो दशक में बस्तर में बदलाव के दौर को देखें तो यह पता चलता है कि छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र नक्सलियों के गढ़ के रूप में पूरे देश में जाना जाता रहा। यहां के ग्रामीणों का साथ माओवादियों को मिला और वे अपना क्षेत्र बढ़ाते रहे। समय के साथ उनकी गतिविधियों के बढ़ने के साथ ही युवाओं को इस ओर मोड़ने का प्रयास चलता रहा। छत्तीसगढ़ की सत्ता में आदिवासियों की भूमिका अहम होती है। प्रदेश की एक तिहाई आबादी और एक तिहाई विधानसभा सीटों पर इनका दबदबा है। प्रदेश में सरकारें किसी की भी हो उनके फोकस में आदिवासी हमेशा से रहे हैं। यही वजह है कि ढाई साल में ही कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने छोटी-बड़ी 20 से ज्यादा योजनाएं उन क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के लिए लागू की हैं।
यहां के लोंगो से किए गए वादे को पूरे करने के साथ ही उन्हें रोजगार से जोड़ने का बड़ा अभियान चलाया गया। यहां पर महिला स्व सहायता समूह और किसानों के समूह के माध्यम से प्रसंस्करण उद्योग स्थापित करने के प्रयासों में सफलता मिली। सफ लता का यह ग्राफ माओवादियों को नागवार गुजरा उन्होंने अपने तरीके से ग्रामीणों को डराने का प्रयास किया, पर सरकार ने उन क्षेत्रों में जहां उनका वर्चस्व ज्यादा है वहां पर अभियान चलाकर उन्हें भी राह में लाने अभियान शूरू किया। माओवादी से जूड़े लोगों को समर्पण कराकर उनकी हैसियत के अनुसार पुनर्वास का पैकेज देकर मुख्य धारा से जोड़ा गया। अब यहां पर नक्सली मुठभेड़ की घटनाएं कम होने के साथ ही विकास के कार्यों को मुर्त रूप देने का अभियान सरकार ने किया। यहां पर इन घटनाओं में शामिल लोगों को पकड़ने के अलावा ऐसे ग्रामीण जिन्हें उनके सहयोगी के रूप में पकड़ा गया था उनकी समीक्षा कर जबरन फंसाए गए लोगों को छोड़ा गया। अब वे खुली हवा में सांस लेने के साथ ही अपने और बस्तर के हित में काम करने के बारे में सोचने लगे हैं।
बस्तर की जनजातीय संस्कृति
आदिवासी कलाओं में बस्तर की आदिवासी परंपरागत कला कौशल प्रसिद्ध है। धातु कला में ताम्बे और टीन मिश्रित धातु के ढलाई किये हुए कलाकृतियां बनायीं जाती है, जिसमें मुख्य रूप से देवी देवताओं की मूर्तियां, पूजा पात्र, जनजातीय संस्कृति की मूर्तियां, और घरेलु साज-सज्जा की सामग्रियां बनाई जाती है। जनजातीय संस्कृति के केन्द्र के रुप में प्रसिद्ध बस्तर के लोक नृत्य, स्थानीय बोलियां, साहित्य एवं शिल्पकला के संरक्षण और संवर्धन के लिए (बादल) की शुरूआत हुई। कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने इन सभी कलाओं को आगे बढ़ने उन्हें सहायोग की शुरूआत करने के साथ ही इन्हें संरक्षण देने का बीड़ा उठाया है।
प्राकृतिक सौंदर्य, आदिम संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण
छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल प्राकृतिक सौंदर्य, आदिम संस्कृति और सभ्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। कई ऐतिहासिक-पुरातात्विक स्थलों जैसे मामा भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, दंतेश्वरी मंदिर, विष्णु मंदिर, गणेश मंदिर, कुटुम्बसर गुफा आदि यहां अवस्थित हैं। साथ ही हरे भरे साल-सागौन के तथा मिश्रित वन और कल-कल करते झरनों का सौंदर्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते है। इन सभी क्षेत्रों में बस्तर प्राधिकरण के प्रस्ताव पर यहां राजकीय भाषा छत्तीसगढ़ी के अलावा गोंडी, हल्बी, भतरी, धुरवी, दोरली आदि भाषाएं बोली जाती हैं। बस्तर संभाग में सबसे ज्यादा बोले और समझे जाने वाली भाषा हल्बी है।
वनों की रक्षा का संकल्प
वहीं सामुदायिक वन अधिकार पत्र प्राप्त भूमि का उपयोग भी वनों की रक्षा के लिए किया जा रहा है। सामुदायिक अधिकार के तहत प्राप्त इस वन भूमि में वृक्षों की रक्षा के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि धान उपार्जन के लिए वनों को काटने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि लोग इन्हीं वनों को देखने दूर दूर से आएंगे, जिसके माध्यम से आपकी आमदनी आसानी से हो जाएगी। इसी लक्ष्य को लेकर कार्य किया जा रहा है। यहां की संस्कृति को समझने के लिए आने वाले पर्यटकों को होमस्टे की सुविधा प्रदान की जा रही है अतिथि पर्यटकों को इनके माध्यम से यहां की संस्कृति से अवगत कराया जाएगा। समावेशी मॉडल के साथ बस्तर के पर्यटन का विकास किया जाएगा।
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