राज्य में सालाना करीब 1 करोड़ 27 लाख मीट्रिक टन धान का उत्पादन

रायपुर। चावल उत्पादन में शीर्ष राज्यों में शामिल छत्तीसगढ़ में चावल से एथेनॉल बनाने की योजना फिलहाल अधर में लटकती नजर आ रही है। चावल से एथेनॉल बनाने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति मिलने के बाद प्रदेश में एथेनॉल इकाइयों के जल्द स्थापित होने की उम्मीद थी, लेकिन अभी तक एक भी इकाई स्थापित नहीं हो पाई है। केंद्र सरकार, फूड कॉपोर्रेशन ऑफ इंडिया यानी एफसीआई से चावल खरीदकर एथेनॉल बनाने की बात कह रही है, जबकि राज्य सरकार अपने सरप्लस चावल से एथेनॉल बनाना चाहती है। केंद्र और राज्य की इस तनातनी के कारण चावल से एथेनॉल की योजना जमीन पर नहीं उतर पा रही है।

राज्य में नवंबर 2018 में कांग्रेस पार्टी की सरकार आने के लगभग छह महीने बाद ही धान से एथेनॉल बनाने की संभावना पर काम शुरू कर दिया गया था। 13 अगस्त 2019 को मंत्रिमंडल ने धान, गन्ना, पुआल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि से बॉयो-एथेनाल उत्पादन के लिए संयंत्र की स्थापना को प्रोत्साहित करने का फैसला लिया। अनुमान यह था कि अगले छह महीनों में राज्य में एथेनॉल उत्पादन संयंत्र स्थापित हो जाएंगे। लेकिन मामला फाइलों में ही उलझा रहा, हालत ये हुई कि राज्य की औद्योगिक नीति में छह महीने के भीतर एथेनॉल उत्पादन संयंत्र लगाये जाने पर इंसेंटिव दिए जाने संबंधी फैसले को 18 महीने तक बढ़ाना पड़ा।

सात निवेशकों से एमओयू

पिछले साल सितंबर से दिसंबर के बीच सात निवेशकों के साथ राज्य सरकार ने एथेनॉल उत्पादन संयंत्र के लिए 1162 करोड़ रुपये का एमओयू भी किया, छत्तीसगढ़ सरकार ने तकरीबन 6 लाख मीट्रिक टन चावल से एथेनॉल उत्पादन का लक्ष्य रखा था। इन संयंत्रों से आरंभिक तौर पर प्रतिदिन 890 किलोलीटर एथेनॉल उत्पादन की योजना बनाई गई. लेकिन कागजों से इतर धरातल पर हाल ये है कि अभी तक संयंत्रों की स्थापना के लिए भूमि चयन की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पाई है। एथेनॉल प्रोजेक्ट पर तेजी के काम चल रहा है। केंद्र सरकार से इस दिशा में लगातार बातचीत चल रही है। केंद्र सरकार ने एथेनॉल प्रोजेक्ट के लिए एनवॉयरमेंट क्लियरेंस में छूट प्रदान की है। इससे संयत्र स्थापित होने के काम में और तेजी जाएगी। केंद्र ने गन्ना और मक्का से एथेनॉल बनाने को पहले ही मंजूरी दे दी है।

धान का बंफर उत्पादन

असल में 2500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का फैसला राज्य सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया है। दरअसल छत्तीसगढ़ देश धान की सबसे ज्यादा कीमत देने वाला राज्य है। देश में धान का न्यूनतम मूल्य पिछले साल 1868 रुपये क्विंटल था लेकिन छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार सत्ता में आने के बाद से ही 2500 रुपये का रेट दे रही है। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान का बंपर उत्पादन होता है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में सालाना करीब 1 करोड़ 27 लाख मीट्रिक टन धान का उत्पादन होता है। इनमें से वर्ष 2020-21 में राज्य सरकार ने रिकॉर्ड 92 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की है। वर्ष 2018-19 में 80.38 व 2019-20 में 83.94 लाख मीट्रिक धान की खरीदी की गई थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा चावल खरीदी की मात्रा कम किये जाने से खरीदे गये धान का उपयोग एक बड़ी समस्या है। अरबों रुपये के धान पिछले कई-कई सालों से खरीद कर रखे हुए हैं और खुले में रखे गए धान, सड़ रहे हैं।

साढ़े 15 लाख टन धान गोदामों में पड़ा

छत्तीसगढ़ में खाद्य विभाग के विशेष सचिव मनोज सोनी के अनुसार, 2020-21 में खरीदे गए 92 लाख मीट्रिक टन धान में से 76.44 लाख मीट्रिक टन धान मीलिंग (चावल बनने के लिए) के लिए दिया जा चुका है लेकिन 15.56 लाख मीट्रिक टन धान अभी भी गोदामों में पड़ा हुआ है। इसके अलावा 2500 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर खरीदे गए 9.65 लाख मीट्रिक टन धान को महज 1200 रुपये से 1400 रुपये प्रति क्विंटल में नीलाम करना पड़ा है। 15.56 लाख मीट्रिक टन धान अभी भी गोदामों में पड़ा हुआ है। जाहिर है, सरकार इस तरह के घाटे से निपटने के लिए चावल से एथेनॉल निर्माण को एक महत्वपूर्ण कदम मान कर चल रही थी। हमारे पास सरप्लस धान होता है। हर साल भारत सरकार हमें जितना चावल उपार्जन का लक्ष्य देती है, उससे अधिक धान हमारे पास होता है। हमने हमेशा भारत सरकार से कहा कि अगर आप हमारे सरप्लस धान का पूरा चावल नहीं लेते तो सरप्लस चावल का एथेनॉल बनाने की अनुमति दे दें, लेकिन केंद्र सरकार हमें अनुमति नहीं दे रही है। केंद्र सरकार एफसीआई से चावल खरीदकर एथेनॉल बनाने बोल रही है।

राज्य पुल के चावल से एथेनॉल बनाने की मिले अनुमति

छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण भी प्रतीक्षा में हैं कि जल्दी से जल्दी मामला निपटे और राज्य में चावल से एथेनॉल बनाने का काम शुरू हो। छत्तीसगढ़ सरकार धान से एथेनॉल बनाने को बढ़ावा दे रही है। इसके लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तीन बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख चुके हैं। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री और खाद्य मंत्री से भी उन्होंने पिछले दिनों मुलाकात की है। मुख्यमंत्री की पहल के बाद केंद्र सरकार कह रहा है कि एफसीआई के पास जो अतिशेष चावल है, उससे एथेनॉल बनाना प्रारंभ करें। परंतु राज्य सरकार प्रयास कर रही है कि एफसीआई के अलावा राज्य पूल के चावल से एथेनाल बनाने की अनुमति दी जाए।

बायोफ्यूल पर पहले भी हुआ काम

राज्य में यह पहला अवसर नहीं है, जब बायोफ्यूल बनाने की योजना पर काम हो रहा हो। रमन सिंह की भाजपा सरकार ने 2006-07 में रतनजोत यानी जैट्रोफा से बायोफ्यूल बनाने की योजना पर काम शुरू किया था। राज्य के एक बड़े हिस्से में रतनजोत के पौधे लगाए गये थे और तब राज्य के मुख्यमंत्री ने नारा दिया था- ‘डीजल नहीं अब खाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से।’ सरकार का दावा था कि 2014 तक छत्तीसगढ़ डीजल के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएगा। मीडिया में खबरे छपती रहीं कि सरकारी गाडिय़ां इसी रतनजोत के तेल से चल रही हैं। बताया गया कि रेलवे और उड्डयन विभाग में रतनजोत के तेल का उपयोग किया जा रहा है लेकिन 2014 आते-आते इस योजना का दम निकल गया। अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी अच्छी गुणवत्ता के बीज की अनुपलब्धता के कारण योजना बंद हो गई।