रायुपर। छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं के बीच आदिवासी नेता नंदकुमार साय की अलग ही पहचान है। भारतीय जनता पार्टी में इनकी छवि सहज राजनीति करने वाले नेता के रूप में है। लेकिन बीजेपी का ये कद्दावर नेता करीब डेढ़ दशक से उपेक्षा का शिकार हो चुका है। शायद यही वजह है कि कभी-कभी वे सार्वजनिक मंच से भी पार्टी के खिलाफ बोलने से पीछे नहीं हटते। लेकिन पार्टी की ये खिलाफत कहीं आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए भारी ना पड़ जाए। चुनाव नजदीक आते ही पार्टी के दिग्गज नेताओं के बगावती सुर सामने आने लगे हैं। बीते दिनों नंदकुमार साय ने भी ऐसी ही कुछ बातें कही है जो पार्टी के लिए डैमेजर का काम कर सकती है।
नंदकुमार साय की इस उपेक्षा का दर्द बीते दिनों खुद नंदकुमार साय ने बयां किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश संगठन तक तो ठीक है, केंद्र में भी इनकी बातों का अब कोई मोल नहीं रह गया है। ये खुद साय ने ही बताया है। उन्होंने बताया कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले ही उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को छत्तीसगढ़ बीजेपी की खराब स्थिति के बारे में बता दिया था। लेकिन उनकी ये हिदायत कुछ काम नहीं आई, जिसका खामियाजा भाजपा को अपनी सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा।


मेहनत हमने की और सिंहासन रमन सिंह को – साय
साय ने तो यहां तक कह दिया कि पार्टी ने उनके साथ धोखा किया है। उन्होंने साल 2003 के विधानसभा चुनाव के लिए रमन सिंह को केंद्र के राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर छत्तीसगढ़ में एंट्री कराने को लेकर दुख जताया। उन्होंने कहा कि उस चुनाव में ना तो रमन सिंह का कोई योगदान था और ना ही कोई मेहनत। फिर भी उन्हें सीएम पद से नवाजा गया। उस समय पार्टी ने उनके साथ धोखा किया। साय का कहना है कि हर बार चुनाव प्रचार की कमान संभालने के लिए उन्हें आगे किया गया, लेकिन पद डॉ. रमन सिंह को दिया।


साय के नेतृत्व परिवर्तन की सलाह भी आलाकमान ने नहीं मानी
2018 विधानसभा में भाजपा की हालत से साय ने केंद्रीय नेतृत्व को पहले ही आगाह कर दिया था। लेकन साय के मुताबिक प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के ही कुछ लोगों की साजिश की वजह से उनकी इस सलाह हो नजरअंदाज कर दिया गया। अब की स्थिति को लेकर भी साय का केंद्रीय नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। उनके हिसाब से तो भारतीय जनता पार्टी की लुटिया इस भी डूबने वाली है। नेतृत्व मायने रखता है। जब तक चेहरा नहीं बदला जाएगा तब तक भाजपा की सूरत नहीं बदलेगी। बैठकों का दौर चलता रहेगा, मीटिंग होती रहेगी लेकिन जब तक नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा तब तक बीजेपी की नईया पार नहीं लगेगी।