अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया, जो एशिया में सबसे उच्च अमेरिकी टैरिफ़ माना जा रहा है। यह टैरिफ़ 27 अगस्त 2025 से लागू हुआ। पहले यह 25 प्रतिशत था, लेकिन भारत के रूस से तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत का टैरिफ़ भी जोड़ दिया गया। कई लोगों ने सवाल उठाया कि भारत ने चीन जैसी कड़ी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।
1. घरेलू और निर्यात बाज़ार पर असर
जयंत दासगुप्ता, जो भारत के पूर्व WTO राजदूत रह चुके हैं, बताते हैं कि भारत के प्रमुख आयातित उत्पाद खनिज ईंधन, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल्स, प्लास्टिक और कटे-घिसे हीरे हैं। ये उत्पाद अधिकांशतः कच्चे माल या इंटरमीडिएट स्तर के हैं। अगर भारत ने अमेरिका पर जवाबी टैरिफ़ लगाया होता, तो इससे न केवल निर्यात पर असर पड़ता बल्कि घरेलू बाज़ार को भी नुकसान होता। साथ ही, सेवा क्षेत्र (Service Sector) में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था। इसलिए विशेषज्ञों ने इसे टालना ही सुरक्षित विकल्प माना।
2. रणनीतिक संसाधनों की कमी
चीन अमेरिका के खिलाफ जवाबी टैरिफ़ लगाने में सक्षम रहा क्योंकि उसके पास रेयर अर्थ मिनरल्स जैसे रणनीतिक उत्पाद थे। भारत के पास ऐसी कोई महत्वपूर्ण वस्तुएँ नहीं हैं, जिन्हें अमेरिका के तकनीकी और रक्षा क्षेत्र पर बड़ा प्रभाव डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सके। भूटान के पत्रकार तेनज़िंग लामसांग के अनुसार, भारत के निर्यात को आसानी से दूसरे देशों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। इसलिए चीन जैसी प्रतिक्रिया भारत के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं थी।
3. ट्रंप के गुस्से का खतरा
अन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत ने अमेरिका पर टैरिफ़ लगाया होता, तो ट्रंप और अधिक टैरिफ़ लगा सकते थे। अमेरिका के लिए भारत की निर्यात मात्रा उसकी आयात मात्रा से काफी अधिक है। इसलिए जवाबी कार्रवाई घाटे का सौदा साबित हो सकती थी। आनंद राठी वेल्थ लिमिटेड के चीफ इकोनॉमिस्ट सुजान हाजरा कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप रूस से व्यापार जारी रखते हैं, लेकिन केवल भारत को निशाना बनाया गया।
4. आईटी सेक्टर पर असर
भारत के आईटी और सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात लगभग 224 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, जिसमें 54.7 प्रतिशत अमेरिका को निर्यात किया जाता है। इकॉनॉमिक्स रिसर्च के संस्थापक जी. चोक्कालिंगम के अनुसार, अगर भारत ने जवाबी टैरिफ़ लगाया, तो यह सेक्टर गंभीर संकट में पड़ सकता था। आईटी निर्यात पर असर से भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
रूस से तेल और अमेरिकी व्यापार संतुलन
भारत ने रूस से तेल खरीदकर मार्च 2025 तक लगभग 3.8 अरब डॉलर की बचत की। हालांकि पिछले साल भारत ने अमेरिका को लगभग 87 अरब डॉलर का निर्यात किया। वॉरेन पैटरसन के अनुसार, कुछ अरब डॉलर की तेल छूट बचाने के लिए इतनी बड़ी निर्यात राशि खतरे में डालना व्यावहारिक नहीं था।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए अमेरिका के टैरिफ़ का जवाब टैरिफ़ के रूप में देना सही विकल्प नहीं है। इसके बजाय भारत को कूटनीति, घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते करना चाहिए। इससे भारत अमेरिकी टैरिफ़ के प्रभाव को कम कर सकता है और आईटी, निर्यात व सेवा क्षेत्रों में संतुलन बनाए रख सकता है।
भारत ने चीन की तरह प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन यह रणनीति दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था और व्यापार सुरक्षा के लिहाज से लाभकारी साबित होगी।
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