यदि आप बलौदाबाजार या कसडोल से रायपुर बस में आ रहे हैं तो अपनी कुर्सियों की पेटी के साथ-साथ जेब भी थोड़ी टाइट कर लें क्योंकि रायपुर जिसे की सीमा में घुसते ही आपको सिर्फ और सिर्फ पैसों की ही जरुरत पड़ेगी। क्योंकि रायपुर में जब से नया बस स्टैंड भाटागांव में शिफ्ट हो गया है ऑटो वालों की चांदी हो गई है। बिगड़ी हुई व्यवस्था और लचर प्रशासन के कारण ऑटोवालों के पांव जमीन पर नहीं है। बात यदि भिलाई या धमतरी रुट के यात्रियों की करें तो ये जैसे-तैसे शहर के अंदर तक को आ रहे हैं ।

रायपुर शहर में बना एक और अघोषित बस स्टैंड


लेकिन इस मामले में बलौदाबाजार या फिरकसडोल के यात्री खुशकिस्मत नहीं है। क्योंकि बस संचालक अपनी बसों को विधानसभा के बाद सड्डू फ्लाईओवर तक ही ला रहे हैं। जिससे य़ात्रियों को तिगुनी कीमत देकर शहर के अंदर आना पड़ रहा है. यहां पर ऑटो चालकों का पूरा कुनबा सक्रिय हो गया है। जो अनाप-शनाप रेट लेकर यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठा रहा है। कुछ बस ऑपरेटरों से इन ऑटो चालकों की सेटिंग की बात यदि की जाए तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस व्यवस्था को किसके आदेश पर चालू किया गया। ये कोई नहीं जानता। बसों को शहर के बाहर रोककर वहां से ऑटो से शहर केअंदर लाने का ऑर्डर कब निकला ये भी कोई नहीं जानता। लेकिन बस वालों ने अपने मन से ही एक जगह तय की और शुरु हो गया मनमानीका खेल।

अब इस खेल में खिलाड़ी तो थे लेकिन रेफरी नहीं थे। लिहाजा ऑटो वालों ने रेफरी की भूमिका अदा करनी शुरु कर दी। रायपुर के नयेअघोषित बस स्टैंड में बसें बेतरतीब 15 नवंबर से रुक रहीं हैं। आधा महीना से ऊपर गुजर चुका है। लेकिन प्रशासन, पुलिस और ट्रैफिक विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा है। ना तो बस वालों से ये पूछा गया कि उन्हें सड्डू तक ही आने की परमिशन किसने जारी की और ना ही पुलिस ने कभी इस मामले में हस्तक्षेप किया। अब इस पूरे खेल में जनता ही पिस रही है।

बालौदाबाजार से किराया 80 रुपए, सड्डू से रायपुर सिटी 250


अब इसे आप विडंबना ही मानिए बालौदा बाजार से रायपुर का किराया 80 रुपए तक ही है। लेकिन यदि आप सामान के साथ सड्डू उतर जाए तोऑटो वाले 250 रुपए में आपको शहर के अंदर लाने का ले लेंगे। हालात उस समय और बिगड़ जाते हैं जब आप शाम के बाद या फिर बिल्कुल सुबह इस इलाके में उतरे।साधन नहीं होने से ऑटो चालक मनमाने तरीके से रेट वसूल रहे हैं.।


पहले इन रुट्स पर खरोरा तक सिटी बसें चला करती थीं। लेकिन बस स्टैंड को बाहर करने के बाद ना तो सिटी बसें सड़कों पर उतरी और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था हुई। लिहाजा अब सवारियों का सारा दारोमदार ऑटो पर ही आकर अटक गया। यदि वक्त रहते बालौदाबाजार की बसों को भाटागांव बस स्टैंड तक नहीं पहुंचाया गया तो जनता बिना मतलब का लुटते रहेगी। वहीं ये खेल कितने दिन चलेगा ये भी कोई नहीं जानता । हां एक बात तो साफ है जनता पहले भी मूर्ख बन रही थी और अब भी बन ही रही है।