बिहार वोटर लिस्ट विवाद ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है,
जहां सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सीधे सवाल पूछते हुए कहा –
“अगर चुनाव आयोग गलत है, तो तथ्य पेश कर स्पष्ट रूप से साबित करें।”

राज्य में चल रही मतदाता सूची की विशेष समीक्षा पर
विपक्षी दलों और एक्टिविस्टों ने सवाल खड़े किए हैं।

कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

10 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान,
चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि उन्हें अब तक सभी याचिकाओं की प्रतियां नहीं मिली हैं,
जिससे जवाब देना कठिन हो रहा है।

वहीं याचिकाकर्ता वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि
वोटर लिस्ट संशोधन का कानून में स्पष्ट प्रावधान है,
लेकिन आयोग ने ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ नामक नई प्रक्रिया बना ली है,
जिससे पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

जानिए याचिकाओं में उठाए गए 5 अहम सवाल

1. कानून और संविधान का सीधा उल्लंघन

याचिकाओं में कहा गया है कि यह निर्णय
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960
और संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325, 326 का उल्लंघन करता है।

2. नागरिकता और दस्तावेज पर भ्रामक नीति

कुछ याचिकाओं में दावा किया गया है कि यह प्रक्रिया
नागरिकता, जन्मस्थान और निवास प्रमाण की अव्यवस्थित मांग करती है।

3. लोकतंत्र की आत्मा पर चोट

वोटर वेरीफिकेशन प्रक्रिया को
लोकतांत्रिक प्रणाली की मूल आत्मा के खिलाफ बताया गया है।

4. आर्थिक और सामाजिक असमानता

प्रवासी मजदूरों, गरीबों और महिलाओं पर
इस प्रक्रिया का अनुपातहीन बोझ पड़ रहा है।

5. समय की गंभीर चूक

विपक्षी पार्टियों का दावा है कि
चुनाव से ठीक पहले इस प्रक्रिया को लागू करना
कई योग्य मतदाताओं को अधिकार से वंचित कर सकता है।

चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण

चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि
2003 की वोटर लिस्ट में जिनके नाम पहले से हैं,
उन्हें कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करना होगा।

जिनके माता-पिता का नाम 2003 की सूची में था,
उन्हें केवल जन्मस्थान और जन्मतिथि का प्रमाण देना होगा।
यह पूरी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुरूप ही है।

बिहार वोटर लिस्ट विवाद अब संवैधानिक बहस में तब्दील हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से यह तय होगा कि
मतदाता सूची की प्रक्रिया पारदर्शी और लोकतांत्रिक है या नहीं।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि
क्या न्यायालय चुनाव आयोग की नीति को सही मानता है
या फिर इसमें बदलाव के आदेश देता है।