आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यह अनुमान लगाना असंभव है कि कौन सा कुत्ता आक्रामक हो सकता है और कौन नहीं। इसी संदर्भ में कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या कुत्तों को यह सिखाया जा सकता है कि वे किसी को नुकसान न पहुंचाएं।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सभी आवारा कुत्तों को पकड़ना या शेल्टर होम में रखना न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से संभव। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोकथाम इलाज से बेहतर होती है, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक और कानूनी तरीकों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा समस्या की बड़ी वजह कानूनों का सही तरीके से लागू न होना है।
गेटेड कम्युनिटी में कुत्तों की मौजूदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में समुदाय को मतदान के जरिए निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए। यदि अधिकांश निवासी इसे बच्चों और आम नागरिकों के लिए खतरा मानते हैं, तो उनकी राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पशु प्रेम का अर्थ मानव जीवन की अनदेखी नहीं हो सकता।
अदालत ने पशु प्रेमियों से अपील की कि वे शेल्टर होम में मौजूद कुत्तों की देखभाल और भोजन की जिम्मेदारी निभाएं। इससे सड़कों पर आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए कि इस संवेदनशील विषय पर संतुलित और व्यावहारिक नीति की आवश्यकता है। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
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