80 के दशक में सक्रीय हुए और 32 के उम्र में बने विधायक

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 80 के दशक में जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। भूपेश ने राजनीति की पारी यूथ कांग्रेस के साथ शुरू की थी। दुर्ग जिले के रहने वाले भूपेश दुर्ग के यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1994-95 में भूपेश बघेल को मध्यप्रदेश यूथ कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया। 1993 में जब मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो भूपेश कांग्रेस से दुर्ग की पाटन सीट से उम्मीदवार बने और जीत दर्ज की। 1998 इसके बाद अगला चुनाव भी वो पाटन से ही जीते। जब मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार बनी, तो भूपेश कैबिनेट मंत्री बने। 2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और पाटन छत्तीसगढ़ का हिस्सा बना। तो भूपेश छ्त्तीसगढ़ विधानसभा पहुंचे. वहां भी वो कैबिनेट मंत्री बने। 2003 में कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हो गई, तो भूपेश को विपक्ष का उपनेता बनाया गया। वह 2008 के चुनाव में पाटन विधानसभा स चुनाव हार गए। 2009 में रायपुर लोकसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने 2013 के चुनाव में फिर से पाटन विधानसभा सीट जीता। 2018 में पांचवीं बार विधानसभा के लिए पाटन से निर्वाचित हुए।

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष

भूपेश बघेल अक्टूबर 2014 से जून 2019 तक छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। राज्य के शीर्ष कांग्रेस नेता जैसे महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल, नंद कुमार पटेल और 28 अन्य लोग दरभा घाटी में 2013 के नक्सली हमले में मारे गए। बघेल ने राज्य में पार्टी को पुनर्जीवित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी अध्यक्षता में छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने 2018 छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बहुमत से जीत हासिल की।
संकट की घड़ी में मिली थी भूपेश बघेल को कांग्रेस की जिम्मेदारी
राज्य में कांग्रेस की पहली पंक्ति के नेता झीरम घाटी नक्सली हमले में मारे जा चुके थे, जिसमें विद्याचरण शुक्ला, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा मुख्य तौर पर शामिल थे। ऐसे में पार्टी में न सिर्फ नेतृत्व का संकट था बल्कि लगातार तीन चुनाव हार चुकी पार्टी हताश थी।

जोगी को किया बाहर, खुद संभाली कमान

बघेल को जो जिम्मेदारी मिली वो किसी चुनौती से कम न थी। उन्होंने न सिर्फ पार्टी में नई जान फूंकी, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके बेटे अमित जोगी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने का साहस किया। जब कांग्रेस के बड़े नेता मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ सॉफ्ट रुख अख्तियार किए हुए थे और यहां तक कि जोगी को बीजेपी की ‘बी टीम’ कहा जाने लगा था, तब बघेल ने विधानसभा के भीतर और बाहर बीजेपी सरकार पर सीधा हमला बोला. प्रदेश के कई मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे। उन्होंने पदयात्राएं कीं और रमन सरकार को घेरा। विधानसभा चुनाव से पहले बघेल की प्रदेश के कई हिस्सों में पदयात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरा। भूपेश बघेल ने खुद छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं की नब्ज पकड़कर उसे चुनावी मुद्दा बनाया और इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करवा बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया।

मुकदमों से भी नहीं डिगे बघेल
जैसे-जैसे भूपेश बघेल का हमला रमन सरकार पर बढ़ता गया, वैसे ही बघेल और उनके परिवार पर कई तरह के मुकदमे भी लड़े।ं रमन सिंह सरकार के मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी एक कथित सेक्स सीडी के मामले में जब भूपेश बघेल को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया, तब उन्होंने जमानत लेने से इनकार कर दिया। लेकिन बाद में आलाकमान के कहने पर वे बेल पर रिहा हुए और चुनाव की कमान संभाली। बघेल के इस रुख ने उनकी छवि उस योद्धा के तौर बनाई जो किसी भी तरह के दबाव में झुकने वाला नहीं था।

कुर्मी जाति का खासा प्रभाव

एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले बघेल राज्य में राजनीतिक दृष्टिकोण से अहम कुर्मी जाति से आते हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन भी छत्तीसगढ़ की ओबीसी बेल्ट में खासा अच्छा रहा। मौजूदा सांसद और कांग्रेस के ओबीसी सेल के अध्यक्ष ताम्रध्वज साहू ने भी साहू समुदाय को कांग्रेस की तरफ लाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि कुर्मी समुदाय को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और बघेल साल 1993 से ही मनवा कुर्मी क्षत्रीय समाज के संरक्षक रहे हैं। राज्य में कुर्मी और साहू समुदाय कुल आबादी का 36 फीसदी है जो किसी भी दल को जीत दिलाने के लिए काफी हैं।
जातीय गणित के अलावा भूपेश बघेल की जो सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि वो यह है कि जब ऐसा माना जा रहा था कि जोगी फैक्टर के चलते बीजेपी एक बार फिर सरकार बना लेगी। तब बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल कर सियासी पंडितों को हैरान कर दिया।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री

15 वर्षों तक छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व करने के बाद, बघेल फिर से पाटन विधानसभा सीट से विधायक बने और भाजपा के रमन सिंह को हराकर छत्तीसगढ़ के तीसरे मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 17 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। बघेल ने दो बड़े चुनावी वादों को पूरा किया, शपथ ग्रहण समारोह के कुछ घंटों के भीतर ही कृषि ऋण माफी और अपेक्षाकृत जल्दी तरीके से धान समर्थन मूल्य 2500 रुपए प्रति क्विंटल किसानों को दिया गया। हालांकि किसानों को वास्तविक धन हस्तांतरण कुछ दिनों, हफ्तों और महीनों में हुआ। तेंदूपत्ता संग्रहण की कीमतों में वृद्धि की गई। सरकार ने शिक्षा-कर्मी नियमितीकरण ओर 15,000 स्थायी शिक्षकों के पदों की भर्ती की घोषणा की।

परिवारिक पृष्ठभूमि

भूपेश बघेल का जन्म 23 अगस्त 1961 को दुर्ग के एक कृषक परिवार में हुआ था। वह नंद कुमार बघेल और बिंदेश्वरी बघेल के पुत्र हैं। किसान परिवार में पैदा होने के कारण ही कठिन परिश्रम, सही निर्णय लेने का साहस उन्हें बचपन में ही अपने पिता से मिला। उन्होंने मुक्तेश्वरी बघेल से शादी की। उनका एक बेटा और तीन बेटियां हैं। भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के अब तक सबसे जोशीले, कर्मठ, ऊर्जावान व यशश्वी मुख्यमंत्री हैं। राजनीति का अनुभव, संघर्षशील, मिलनसार, तीव्र बुद्धि के धनी, और अपनी कुशल नीतियों के कारण जाने जाते हैं और सत्य का अनुसरण करने वाले, गलत कार्य का विरोध करने वाले व्यक्ति है। वे एक परिश्रमी, आशावादी सोच, पूर्वानुमान का आभास रखने वाले व्यक्ति हैं।