गैस, ब्लोटिंग और बार-बार पेट खराब होने की शिकायत महिलाओं में क्यों ज्यादा दिखती है, इस सवाल का जवाब अब तक अधूरा था. सीडार्स-सिनाई हेल्थ साइंसेज़ यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च ने महिला आंत बैक्टीरिया की बनावट में पुरुषों से अलग पैटर्न खोजकर इस पहेली को समझने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है.
महिला आंत बैक्टीरिया रिसर्च ने अंदर क्या देखा
यह अध्ययन iScience जर्नल में छपा है. टीम ने छोटी आंत यानी स्मॉल बॉवल के माइक्रोबायोम की जांच की और पाया कि महिलाओं और पुरुषों में इसकी बनावट और संगठन दोनों अलग हैं. फर्क सिर्फ बैक्टीरिया की गिनती का नहीं, बल्कि उनकी किस्मों और आपसी तालमेल के तरीके का भी है.
सिर्फ महिलाओं में मिला यह बैक्टीरिया समूह
Granulicatella नाम का एक बैक्टीरिया समूह शोध में सिर्फ महिलाओं की आंत में पाया गया. खास बात यह रही कि जिन महिलाओं को पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम है, जिसे पहले PCOS कहा जाता था, उनमें यह समूह और भी ज्यादा सक्रिय पाया गया.
फ्रक्टेन्स बनाने के तरीके में भी दिखा अंतर
शोधकर्ताओं ने पाया कि छोटी आंत के बैक्टीरिया फ्रक्टेन्स नाम के कार्बोहाइड्रेट को अलग-अलग तरीके से बनाते हैं, यह अंतर भी महिला और पुरुष के बीच साफ नजर आया. फ्रक्टेन्स को लंबे समय से IBS के लक्षण बढ़ाने वाला तत्व माना गया है, और IBS महिलाओं में कहीं ज्यादा देखा जाता है.
विशेषज्ञ इसे क्यों अहम मान रहे हैं
स्टडी की मुख्य लेखिका डॉ. रुचि माथुर का कहना है कि बायोलॉजिकल सेक्स को अब आंत से जुड़ी बीमारियों की रिसर्च में एक जरूरी पहलू मानना होगा. उनके मुताबिक इस फर्क को समझे बिना पर्सनलाइज्ड इलाज की दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल होगा.
आगे इलाज के तरीके में क्या बदलाव संभव है
यह रिसर्च अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इशारा साफ है, पेट की दिक्कतों का “एक जैसा इलाज सबके लिए” वाला पुराना तरीका अब बदल सकता है. आने वाले सालों में महिलाओं के लिए अलग से डिज़ाइन किए गए डाइट प्लान और इलाज के तरीके सामने आने की उम्मीद जताई जा रही है.
फिलहाल घर पर क्या ख्याल रखें
जब तक नई रिसर्च के आधार पर इलाज सामने नहीं आते, तब तक संतुलित भोजन और पर्याप्त पानी पीना पेट की सेहत के लिए मददगार माना जाता है. अगर पेट दर्द, गैस या ब्लोटिंग बार-बार परेशान करे, तो इसे मामूली समझकर टालने की बजाय डॉक्टर को दिखाना बेहतर है.
दशकों से अधूरी रही महिलाओं की सेहत की तस्वीर
लंबे समय तक ज्यादातर मेडिकल रिसर्च पुरुषों के शरीर को आधार मानकर की जाती रही, और उन्हीं नतीजों के आधार पर महिलाओं को भी इलाज दिया जाता रहा. यही वजह है कि IBS, थायरॉइड और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसी कई तकलीफें, जो महिलाओं में ज्यादा देखी जाती हैं, उनकी असली वजह सालों तक ठीक से समझी नहीं जा सकी. यह नई रिसर्च उसी बड़े अंतर को पाटने की दिशा में एक जरूरी शुरुआत मानी जा रही है.
आगे की रिसर्च में क्या बदलाव जरूरी है
वैज्ञानिकों का मानना है कि अब बड़े पैमाने पर ऐसी स्टडीज़ की जरूरत है, जो शुरुआत से ही महिला और पुरुष के डेटा को अलग रखकर आगे बढ़ें, न कि बाद में सिर्फ तुलना करें. इससे सिर्फ IBS ही नहीं, बल्कि थायरॉइड, ऑटोइम्यून बीमारियों और दवाओं के असर को समझने में भी मदद मिल सकती है, क्योंकि आंत के बैक्टीरिया दवा के अब्जॉर्ब होने के तरीके को भी प्रभावित करते हैं.
जेंडर को गट हेल्थ से जोड़कर देखने की जरूरत
आमतौर पर गट हेल्थ को सिर्फ खानपान से जोड़ा जाता है, लेकिन यह रिसर्च दिखाती है कि जेंडर भी उतना ही अहम फैक्टर है. आने वाले समय में डॉक्टर सिर्फ लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि मरीज के जेंडर और माइक्रोबायोम प्रोफाइल के आधार पर भी इलाज तय कर सकते हैं, जिससे नतीजे ज्यादा सटीक होने की उम्मीद है.
महिलाओं के लिए अभी की सबसे बड़ी सीख
जब तक विज्ञान नए इलाज सामने नहीं लाता, तब तक शरीर के संकेतों को गंभीरता से लेना सबसे अहम कदम है. बार-बार पेट फूलना, गैस या अनियमित पाचन को मामूली बात समझकर टालने की बजाय, इसे डॉक्टर के सामने खुलकर रखना बेहतर रहेगा, ताकि सही समय पर सही जांच हो सके.
भारत जैसे देश में जहां महिलाओं की बड़ी आबादी अक्सर अपनी सेहत की शिकायतों को टाल देती है, ऐसी रिसर्च और भी अहम बन जाती है. यह समझना जरूरी है कि पेट की परेशानी केवल खानपान का मसला नहीं, बल्कि शरीर की पूरी बनावट से जुड़ा एक जटिल विषय है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है.
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि आने वाले सालों में इस तरह की रिसर्च मेडिकल पाठ्यक्रम और डॉक्टरों की ट्रेनिंग में भी शामिल की जानी चाहिए, ताकि जेंडर आधारित अंतर को समझना डॉक्टरों के लिए एक सामान्य अभ्यास बन सके, न कि कोई विशेष मामला.
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, यह चिकित्सीय सलाह नहीं है. किसी भी लक्षण या स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य डॉक्टर से सलाह जरूर लें.
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