आज हमारा देश अपनी आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आजादी के इस महोत्सव की सभी को शुभकामनाएं। नि:संदेह ये खुशी का पल है। गर्व का क्षण है और उन वीर सपूतों समेत उन तमाम लोगों को, जिन्होंने मां भारती को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराया, उन्हें याद कर श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का अवसर है, लेकिन इसके साथ इस बात की भी चर्चा होनी चाहिए कि हमारा भारत आज कहां खड़ा है? वैश्विक स्तर पर देखने से पहले भारत खुद में खुद को कहां देखता है? ये विषय, ये बातें, हर साल इस मौके पर ही उठती हैं, लेकिन हर बार ये महज मंच से दिया हुआ एक भाषण बनकर रह जाती है।
स्वाधीनता के इस उत्सव के बीच क्या हम एक नए भारत की कल्पना कर सकते हैं? जो सिर्फ कल्पना ना हो, जो केवल चर्चाओं या विचारों तक सीमित ना हो, बल्कि उस पर अमल हो। ऐसा भारत जहां केवल किताबों या दस्तवेजों में नहीं बल्कि सच में धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्षता की बात हो। जहां आपसी सौहार्द नफरत पर हावी हो। एक ऐसा भारत जहां धर्म के आधार पर लोगों को बांटकर राज न किया जाए।
जवाहर की तरह चमकने वाला अटल भारत
वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा के साथ चलने वाले इस देश में आज क्यों लोग बंटते जा रहे हैं? ये भी एक सवाल है कि देश बंट रहा है या बांटा जा रहा है? हमारी राजनैतिक व्यवस्था को भी अब एक नए, विकसित और खुले विचारों वाली राजनीति के रूप में बदलने की जरूरत है। जो दलगत राजनीति से ऊपर हो। क्यों ना हम एक नया भारत बनाएं, जो गांधी-नेहरू और अटल वाली राजनीति से ऊपर हो? जिससे हम भारत को जवाहर की तरह बना सकें, जो अटल हो, सशक्त हो।
हम एक ऐसा भारत क्यों नहीं देखते जहां की संसद में सार्थक बहस हो। ऐसा सदन जो सबको साथ लेकर चलने वाला हो, ना कि साथ लेकर चलने का दिखावा कर एकतरफा संवाद करने वाला हो।
सुविधाओं पर हावी ना हो आर्थिक स्थिति
ऐसा भारत जहां की न्याय व्यवस्था पर लोगों को अभिमान हो। ऐसी न्याय पालिका जिसमें लोगों को सालों तक न्याय की राह ना ताकनी पड़े। जहां महिलाओं की अस्मिता और गरिमा से खिलवाड़ ना हो। एक भारत जो मौजूदा अर्थव्यवस्था की वास्तविकता को स्वीकार कर एक नया कीर्तिमान स्थापित करे। हम ऐसे भारत की कल्पना क्यों नहीं कर सकते, जहां लोगों को आर्थिक स्थिति के हिसाब से नहीं, बल्कि समान रूप से स्वास्थ्य सुविधा और शिक्षा मिले।
सिर्फ चर्चाओं तक सीमित क्यों हैं हम?
हमें ऐसा भारत नहीं चाहिए, जहां विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ हो। जहां झूठी चमक-दमक वाली इमारतों के लिए धरती की गोद से हरियाली को उजाड़ा जा रहा हो। हजारों पेड़ों की बलि दी जा रही हो। हमें ऐसा भारत चाहिए, जहां पर्यावरण की रक्षा की चर्चा केवल विद्वानों और प्रबुद्धजनों के संवाद का विषय ना हो, बल्कि आने वाली पीढ़ी को खुली हवा में सांस लेने में कोई तकलीफ ना हो।
इस पर भी विचार जरूरी
ऐसा भारत हो, जहां के हर प्रांत का खिलाड़ी ओलंपिक में मेडल हासिल करने का हुनर रखता हो और अंत में, निश्चित ही हमें एक ऐसे मीडिया की बात करनी चाहिए जो वाकई पत्रकारिता के सिद्धांतो पर चले, उसे आत्मसात करे। जो सरकार की स्थाई विपक्ष के रूप में उभरे। अगर हम ऐसे भारत की संकल्पना कर सकते हैं तो नि:संदेह हम गर्व से कह सकते हैं कि हम युवा पीढ़ी को नए भारत की ओर ले जा रहे हैं।
पुन: सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।
Krishna sir is a dedicated news blogger at The Hind Press, known for his sharp insights and fact-based reporting. With a passion for current affairs and investigative journalism, he covers national, international, sports, science, headlines, political developments, environment, and social issues with clarity and integrity.
