नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा बनाए नहीं रख सकता। अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि SC/ST कानून के तहत संरक्षण पाने के लिए व्यक्ति का निर्धारित धर्मों में होना आवश्यक है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया है। यदि कोई व्यक्ति इन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म—जैसे ईसाई धर्म—को अपनाता है, तो वह SC दर्जे का लाभ नहीं ले सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और लंबे समय से पादरी के रूप में कार्य कर रहा था। उसने कुछ लोगों के खिलाफ SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई और कानूनी संरक्षण की मांग की।
हालांकि, आरोपियों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि शिकायतकर्ता अब ईसाई धर्म का पालन करता है, इसलिए वह SC/ST कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों का पात्र नहीं है।
हाईकोर्ट का फैसला
30 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को SC श्रेणी के लाभ नहीं मिल सकते। अदालत ने SC/ST एक्ट के तहत दर्ज धाराओं को भी हटाने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ—जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया—ने कहा कि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि व्यक्ति ने अपने मूल धर्म में वापसी की या नहीं।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता लंबे समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था और पादरी के रूप में सक्रिय था। ऐसे में घटना के समय उसकी धार्मिक पहचान को देखते हुए उसे SC/ST कानून के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
फैसले का महत्व
यह निर्णय देश में आरक्षण नीति और SC/ST कानून के दायरे को लेकर स्पष्टता प्रदान करता है। साथ ही, यह बताता है कि धर्म परिवर्तन का सीधा प्रभाव सामाजिक श्रेणी और कानूनी अधिकारों पर पड़ सकता है।
