सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना में लैंगिक समानता को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमीशन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। यह निर्णय शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत कार्यरत उन महिला अधिकारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्हें अब तक स्थायी नियुक्ति से वंचित रखा गया था।
अदालत ने माना कि भारतीय सेना में महिलाओं के साथ लंबे समय से संस्थागत स्तर पर भेदभाव होता रहा है। इस असमानता को दूर करने के लिए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए न्याय सुनिश्चित किया।
⚖️ पेंशन और अधिकारों पर राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिन महिला अधिकारियों को सेवा से अलग किया गया और जिन्होंने अदालत में न्याय की मांग की, उन्हें 20 वर्षों की सेवा के बराबर पेंशन का अधिकार मिलेगा। यह फैसला उनके लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है।
🏛️ सेना में बराबरी पर जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि सेना में अवसर केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रह सकते। कोर्ट ने कहा कि भविष्य के सभी पदों पर पुरुषों का एकाधिकार स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि गलत मूल्यांकन और अवसरों की कमी के कारण कई महिला अधिकारियों के करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
📌 फैसले की सीमा और निर्देश
यह आदेश विशेष रूप से उन महिला अधिकारियों के लिए लागू होगा, जो कानूनी प्रक्रिया के दौरान सेवा से बाहर हो गई थीं। हालांकि, JAG और AEC कैडर की महिला अधिकारियों को इस फैसले के दायरे से बाहर रखा गया है।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए मानकों और कट-ऑफ प्रणाली की समीक्षा करने का निर्देश दिया है।
📊 विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला तब उठा जब कई महिला अधिकारियों, जिनमें महत्वपूर्ण अभियानों से जुड़ी अधिकारी भी शामिल थीं, ने आरोप लगाया कि पूर्व के न्यायिक निर्देशों के बावजूद उन्हें स्थायी कमीशन देने में भेदभाव किया जा रहा है। इसी पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया।
