भारतीय मुद्रा एक बार फिर दबाव में है और डॉलर के मुकाबले इसका स्तर लगातार कमजोर होता जा रहा है। मार्च 2026 में रुपया 94.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिससे बाजार और आम लोगों के बीच चिंता बढ़ गई है कि क्या रुपया जल्द ही 100 के आंकड़े को छू सकता है।

पिछले 15 वर्षों पर नजर डालें तो 2010 में जहां 1 डॉलर की कीमत करीब 45 रुपये थी, वहीं अब यह लगभग दोगुनी हो चुकी है। इस दौरान रुपये में करीब 109% की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, इसके पीछे कई आर्थिक और वैश्विक कारण काम कर रहे हैं।

तेल और वैश्विक तनाव का सीधा असर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खासकर ईरान से जुड़े हालातों ने कच्चे तेल की कीमतों को 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह बड़ा झटका है, क्योंकि ज्यादा तेल आयात का मतलब ज्यादा डॉलर की मांग और कमजोर रुपया।

विदेशी निवेशकों का रुख बदला

वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर विदेशी निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर जाते हैं। 2026 में भारतीय बाजार से अरबों डॉलर की निकासी ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला।

व्यापार घाटा और डॉलर की बढ़ती मांग

भारत का व्यापार घाटा लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। ज्यादा आयात और कम निर्यात के कारण डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये की कीमत नीचे आती है।

ब्याज दरों का खेल

अमेरिका और भारत के बीच ब्याज दरों का अंतर भी अहम भूमिका निभाता है। जब यह अंतर कम होता है, तो विदेशी निवेशकों के लिए भारत में निवेश का आकर्षण घटता है, जिससे पूंजी बाहर निकलती है।

RBI की रणनीति क्या है?

भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर डॉलर बेचकर अस्थिरता को नियंत्रित किया जा रहा है।

क्या ₹100 के पार जाएगा रुपया?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात तनावपूर्ण बने रहते हैं और तेल कीमतें ऊंची रहती हैं, तो रुपया 95-98 के दायरे में रह सकता है। हालांकि, मजबूत आर्थिक विकास और नीतिगत सुधार रुपये को स्थिरता दे सकते हैं।