दुष्कर्म मामलों में पीड़िताओं की पहचान उजागर होने की घटनाओं पर Supreme Court of India ने गहरी चिंता जताते हुए कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि पीड़िता के सम्मान और निजता के अधिकार पर सीधा हमला भी है।
न्यायमूर्ति Sanjay Karol और N Kotiswar Singh की पीठ ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिए हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि किसी भी न्यायिक आदेश में पीड़िता या उसके परिवार की पहचान किसी भी रूप में सामने न आए।
अदालत ने 2018 के ऐतिहासिक फैसले निपुण सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का उल्लेख करते हुए दोहराया कि किसी भी माध्यम—चाहे वह मीडिया हो या सोशल प्लेटफॉर्म—पर पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि जमीनी स्तर पर इस कानून का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है। अदालतों की लापरवाही और समाज में फैले कलंक को इसकी प्रमुख वजह बताया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संवेदनशीलता की कमी पीड़िताओं को दोबारा मानसिक आघात पहुंचाती है।
कानूनी पहलू को स्पष्ट करते हुए अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 228A का हवाला दिया, जो दुष्कर्म पीड़िताओं की पहचान को गोपनीय रखने के लिए लागू की गई थी। यह प्रावधान पीड़िताओं को सामाजिक बहिष्कार और अपमान से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इस नियम का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में छोटे-छोटे विरोधाभासों के आधार पर आरोपियों को राहत देना उचित नहीं है।
