छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक सहमति से चले लिव-इन रिलेशनशिप में शादी से इनकार करना अपने आप में दुष्कर्म नहीं है। यह निर्णय Chhattisgarh High Court Live-in Case को लेकर कानूनी व्यवस्था में एक अहम मिसाल बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक 40 वर्षीय महिला से जुड़ा है, जो भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक है। उसने आरोप लगाया कि आईआईएम रायपुर में पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी।
दोनों के बीच शादी के वादे के आधार पर संबंध बने, जो लगभग दो साल तक चले। बाद में शादी से इनकार के बाद यह विवाद Chhattisgarh High Court Live-in Case तक पहुंच गया।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि:
- आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके
- संबंध आपसी सहमति से थे
- अभियोजन पक्ष मजबूत सबूत पेश नहीं कर सका
इसी फैसले को चुनौती देकर यह मामला Chhattisgarh High Court Live-in Case के रूप में हाईकोर्ट में पहुंचा।
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणी
न्यायमूर्ति संजय एस अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने कहा कि:
- लंबे समय तक लिव-इन संबंध सहमति को दर्शाता है
- केवल शादी का वादा दुष्कर्म का आधार नहीं हो सकता
- रिश्ते की प्रकृति और आचरण का महत्व होता है
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर Chhattisgarh High Court Live-in Case को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने किन सबूतों को माना अहम?
हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिया:
- महिला ने 30 लाख रुपये में समझौते की बात स्वीकार की
- 15 लाख रुपये का चेक दिया गया था
- मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्ती या चोट के संकेत नहीं मिले
- परिवारों की सहमति से शादी की बात सामने आई
इन सभी आधारों पर कोर्ट ने Chhattisgarh High Court Live-in Case में निचली अदालत के फैसले को सही माना।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि:
- वयस्कों के बीच सहमति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
- बदलते सामाजिक ढांचे में रिश्तों को व्यापक दृष्टि से देखना होगा
- हर असफल रिश्ते को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता
यह दृष्टिकोण भविष्य के Chhattisgarh High Court Live-in Case मामलों में मार्गदर्शक बन सकता है।
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