लैपटॉप स्क्रीन के सामने आंखें मलती हुई महिला, डिजिटल आई स्ट्रेन का उदाहरण

मोबाइल और लैपटॉप स्क्रीन पर घंटों बिताना अब रोज की आदत बन चुकी है. यही आदत डिजिटल आई स्ट्रेन यानी कंप्यूटर विजन सिंड्रोम को तेजी से बढ़ा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार आज एक औसत व्यक्ति दिन में दस घंटे से ज्यादा समय स्क्रीन के सामने बिता रहा है, और स्क्रीन का इस्तेमाल करने वालों में से करीब पचहत्तर प्रतिशत लोगों को आंखों से जुड़ी कोई न कोई तकलीफ महसूस होती है. रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे शहरों में भी वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन पढ़ाई के चलते यह समस्या लगातार बढ़ रही है.

आंखों की थकान का सीधा असर क्या होता है

लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन, भारीपन और धुंधलापन महसूस होने लगता है. इसके साथ सिरदर्द और गर्दन में अकड़न भी आम शिकायत है. यह कोई गंभीर बीमारी नहीं बल्कि आंखों पर बढ़ते दबाव का नतीजा है, लेकिन अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो नींद और काम करने की क्षमता दोनों प्रभावित हो सकती हैं.

डिजिटल आई स्ट्रेन के मुख्य लक्षण

  • आंखों में जलन, खुजली या सूखापन महसूस होना
  • लगातार सिरदर्द रहना, खासकर शाम के समय
  • धुंधला या दोहरा दिखाई देना
  • आंखों का लाल होना और बार-बार पानी आना
  • गर्दन, कंधे या पीठ में दर्द
  • रोशनी के प्रति आंखों का ज्यादा संवेदनशील हो जाना

स्क्रीन टाइम इतना नुकसानदेह क्यों बन रहा है

जब हम स्क्रीन पर देखते हैं तो पलकें झपकाने की रफ्तार अपने आप कम हो जाती है. सामान्य तौर पर एक मिनट में जितनी बार पलकें झपकनी चाहिए, स्क्रीन पर ध्यान लगाने के दौरान यह संख्या करीब आधी रह जाती है. इससे आंखों की नमी कम होती है और सूखापन बढ़ता है. इसके अलावा गलत पोस्चर में बैठना, कमरे में सही रोशनी न होना और स्क्रीन की चमक ज्यादा रखना भी इस समस्या को बढ़ा देता है.

रात में स्क्रीन देखने का असर

सोने से पहले मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल आंखों पर दोहरा असर डालता है. कम रोशनी में स्क्रीन की चमक आंखों को ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर करती है. इससे नींद देर से आती है और अगली सुबह आंखें और भी थकी हुई महसूस होती हैं.

बीस-बीस-बीस नियम सबसे कारगर उपाय है

आंखों के डॉक्टर एक आसान तरीका सुझाते हैं जिसे बीस-बीस-बीस का नियम कहा जाता है. हर बीस मिनट स्क्रीन देखने के बाद बीस सेकंड के लिए किसी ऐसी चीज को देखें जो कम से कम बीस फीट दूर हो. यह छोटी सी आदत आंखों की मांसपेशियों को आराम देती है और थकान को काफी हद तक कम कर देती है.

डिजिटल आई स्ट्रेन से बचने के आसान तरीके

  • हर घंटे में एक छोटा ब्रेक जरूर लें
  • जानबूझकर बार-बार पलकें झपकाएं ताकि आंखें नम रहें
  • स्क्रीन की चमक कमरे की रोशनी के हिसाब से सेट करें
  • मॉनिटर को आंखों से करीब बीस से चौबीस इंच की दूरी पर रखें
  • कमरे में पर्याप्त और सही दिशा से रोशनी आने दें
  • जरूरत पड़ने पर आंखों के डॉक्टर से चश्मे की सलाह लें
  • सोने से एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दें

ऑफिस और पढ़ाई के दौरान क्या ध्यान रखें

जो लोग दिनभर लैपटॉप पर काम करते हैं उन्हें कुर्सी और मॉनिटर की ऊंचाई सही रखनी चाहिए ताकि गर्दन झुकानी न पड़े. बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान भी हर पैंतालीस मिनट बाद पांच मिनट का ब्रेक देना फायदेमंद रहता है. इससे बच्चों की आंखों पर दबाव कम पड़ता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी बनी रहती है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है

अगर आंखों की जलन, सूखापन या सिरदर्द दो-तीन हफ्तों की सावधानी के बाद भी कम नहीं हो रहा, तो आंखों के डॉक्टर से जांच करानी चाहिए. कई बार चश्मे का नंबर बदलने या आंसू की कमी जैसी वजहें भी इसके पीछे हो सकती हैं, जिनकी सही पहचान डॉक्टर ही कर सकते हैं.

ब्लू लाइट फिल्टर और डिवाइस सेटिंग्स का रोल

आजकल ज्यादातर मोबाइल और लैपटॉप में नाइट मोड या ब्लू लाइट फिल्टर का विकल्प मौजूद होता है. इसे शाम के बाद ऑन रखने से स्क्रीन की नीली रोशनी कम हो जाती है, जिससे आंखों पर दबाव थोड़ा कम पड़ता है. इसके अलावा एंटी-ग्लेयर स्क्रीन गार्ड भी रोशनी के सीधे परावर्तन को कम करने में मदद करता है. हालांकि यह सेटिंग्स अकेले पर्याप्त नहीं हैं, इन्हें ब्रेक लेने की आदत के साथ ही अपनाना चाहिए.

कमरे की रोशनी और स्क्रीन की चमक का तालमेल

स्क्रीन बहुत तेज चमक वाली हो या कमरा बहुत अंधेरा हो, दोनों ही स्थिति आंखों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं. सबसे अच्छा तरीका यह है कि स्क्रीन की चमक कमरे की रोशनी के लगभग बराबर रखी जाए. खिड़की के ठीक सामने या पीछे बैठकर काम करने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इससे स्क्रीन पर चमक और परछाई दोनों बढ़ जाती हैं.

आंखों से जुड़ी कुछ आम गलतफहमियां

कई लोग मानते हैं कि चश्मा पहनने से आंखें कमजोर होती जाती हैं, जबकि सच यह है कि सही नंबर का चश्मा आंखों पर पड़ने वाला दबाव कम करता है. यह भी गलतफहमी आम है कि सिर्फ बड़ी उम्र के लोगों को ही आंखों की जांच करानी चाहिए, जबकि स्क्रीन टाइम बढ़ने के कारण अब युवा और बच्चे भी इस समस्या के शिकार हो रहे हैं. नियमित आंखों की जांच हर उम्र के लिए जरूरी मानी जाती है.

खानपान का आंखों की सेहत पर असर

आंखों की सेहत सिर्फ स्क्रीन की आदतों पर ही नहीं, बल्कि खानपान पर भी निर्भर करती है. हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, अंडे और मेवे आंखों को जरूरी पोषण देने में मदद करते हैं. दिनभर पर्याप्त पानी पीना भी आंखों की नमी बनाए रखने में सहायक होता है, जिससे सूखापन और जलन जैसी शिकायतें कम हो सकती हैं.

अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और यह चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है. आंखों से जुड़ी किसी भी लगातार समस्या के लिए योग्य नेत्र विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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