हैवी पीरियड्स इलाज पर रिसर्च करती डॉक्टर और महिला मरीज

हर महीने भारी माहवारी से जूझने वाली महिलाओं के लिए राहत की एक बड़ी खबर सामने आई है. एबरडीन और एडिनबरा यूनिवर्सिटी की टीम को हैवी पीरियड्स इलाज पर एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल चलाने के लिए करीब 2 मिलियन पाउंड की फंडिंग मिली है. यह रिसर्च उन लाखों महिलाओं की जिंदगी बदल सकती है, जो हर महीने भारी ब्लीडिंग की वजह से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी सही तरीके से नहीं जी पातीं.

हैवी पीरियड्स इलाज को लेकर यह ट्रायल क्या है

यह साढ़े तीन साल तक चलने वाला अध्ययन है, जिसे यूके की नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर रिसर्च फंड कर रही है. ट्रायल में एक नई दवा रेलुगोलिक्स-सीटी को मौजूदा इलाजों के मुकाबले टेस्ट किया जाएगा. इसमें कुल 270 महिलाएं हिस्सा लेंगी, जिन्हें बराबर संख्या में दो ग्रुप में बांटा जाएगा — एक ग्रुप को 12 महीने तक रेलुगोलिक्स-सीटी दी जाएगी, जबकि दूसरे ग्रुप को मौजूदा मेडिकल इलाज मिलता रहेगा.

भारी माहवारी की समस्या कितनी आम है

  • दुनियाभर में हर 3 में से 1 महिला हैवी मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग यानी भारी माहवारी से जूझती है
  • इनमें से आधे से ज्यादा महिलाएं इस वजह से अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां ठीक से नहीं कर पातीं
  • करीब 43% महिलाओं को भारी ब्लीडिंग और पेट दर्द की वजह से ऑफिस या काम से छुट्टी लेनी पड़ी है

इतने बड़े आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या सिर्फ एक शारीरिक तकलीफ नहीं, बल्कि महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी, करियर और मानसिक सेहत को भी सीधे प्रभावित करती है.

मौजूदा इलाज में क्या कमी रह जाती है

फिलहाल भारी माहवारी के लिए हार्मोनल गोलियां, आईयूएस डिवाइस और कुछ मामलों में सर्जरी जैसे विकल्प मौजूद हैं. लेकिन कई महिलाओं को इनसे या तो पूरा फायदा नहीं मिलता, या साइड इफेक्ट की वजह से इलाज बीच में छोड़ना पड़ता है. यही वजह है कि हैवी पीरियड्स इलाज के लिए एक बेहतर और आसान विकल्प खोजने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी.

नई दवा रेलुगोलिक्स-सीटी कैसे काम कर सकती है

यह दवा रोज़ एक गोली के रूप में ली जाती है और शरीर में हार्मोन के स्तर को नियंत्रित कर ब्लीडिंग को कम करने में मदद कर सकती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर ट्रायल के नतीजे सकारात्मक रहते हैं, तो यह दवा मौजूदा इलाजों के मुकाबले ज्यादा असरदार और आसान विकल्प साबित हो सकती है.

भारतीय महिलाओं के लिए यह खबर क्यों मायने रखती है

भारत में भी भारी माहवारी को अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे कई महिलाएं सही समय पर इलाज नहीं करातीं. जागरूकता की कमी और झिझक की वजह से यह समस्या अक्सर वर्षों तक अनदेखी रह जाती है. ऐसे में विदेश में हो रहे इस तरह के बड़े ट्रायल की जानकारी होना जरूरी है, ताकि महिलाएं अपनी सेहत को लेकर समय रहते डॉक्टर से सलाह लें और नए इलाज विकल्पों के बारे में भी जागरूक रहें.

कब तक आ सकते हैं ट्रायल के नतीजे

चूंकि यह अध्ययन साढ़े तीन साल तक चलेगा, इसलिए पूरे नतीजे आने में अभी समय लगेगा. लेकिन इस स्तर पर इतनी बड़ी फंडिंग मिलना खुद इस बात का संकेत है कि वैज्ञानिक समुदाय इस समस्या को कितनी गंभीरता से ले रहा है.

अस्वीकरण: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, चिकित्सीय सलाह नहीं. भारी माहवारी या किसी भी असामान्य ब्लीडिंग की स्थिति में योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क जरूर करें.

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