बस्तर दशहरा 2026 अपने 75 दिन के सफर में इस समय बीच के अहम पड़ाव पर है. यह उत्सव 12 अगस्त 2026 को हरेली अमावस्या के दिन जगदलपुर में पाट जात्रा की रस्म के साथ शुरू हुआ था. रामायण से जुड़े आम दशहरे के उलट, बस्तर दशहरा पूरी तरह मां दंतेश्वरी और आदिवासी परंपराओं को समर्पित त्योहार है. यह उत्सव 20 अक्टूबर 2026 तक चलेगा.
बस्तर दशहरा 2026 की शुरुआत कैसे हुई
पाट जात्रा की रस्म में जंगल से लाई गई साल की लकड़ी “थुरलू खोटला” की पूजा की जाती है. यह लकड़ी दशहरे के रथ निर्माण की सबसे पहली और सबसे अहम कड़ी मानी जाती है. इस बार यह लकड़ी बिलोरी गांव के पास के जंगल से लाई गई. बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंज देव के मुताबिक, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और जंगल, आस्था और आदिवासी जीवनशैली के बीच गहरे रिश्ते को दिखाती है.
रथ निर्माण से जुड़ी खास रस्में
पूजा में गुड़, चना, लाई, पान और मिठाई चढ़ाई जाती है. इसके बाद परंपरागत बढ़ई पवित्र लकड़ी पर कील ठोकते हैं, यह मानते हुए कि इससे उत्सव बुरी नजर से बचा रहता है. बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा के अनुसार, यह रस्में पूरी तरह पारंपरिक तरीके से और बड़े उत्साह के साथ निभाई जा रही हैं.
आम दशहरे से कितना अलग है यह उत्सव
बस्तर दशहरा 2026 की सबसे खास बात यह है कि इसका रावण-वध की कहानी से कोई संबंध नहीं. यह पूरी तरह देवी दंतेश्वरी और स्थानीय आदिवासी देवी-देवताओं के मिलन का उत्सव है. कई आदिवासी समुदाय अपने-अपने पारंपरिक देवताओं की पूजा करते हैं, जो अक्सर जंगल, नदी, पहाड़ और प्रकृति से जुड़े होते हैं.
उत्सव की तैयारी सावन महीने के कृष्ण पक्ष से ही शुरू हो जाती है और कई रस्मों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है. इसमें दो मंजिला विशाल रथ बनाया जाता है, जिस पर देवी दंतेश्वरी की छत्रि रखकर जगदलपुर की गलियों में खींचा जाता है.
राजपरिवार और समाज की साझा भागीदारी
ज्यादातर बड़े त्योहार सरकारी विभागों या निजी संस्थाओं के जरिए आयोजित होते हैं, लेकिन बस्तर दशहरा आज भी परंपरागत राजसंस्था और स्थानीय सामाजिक ढांचे से गहराई से जुड़ा है. इसमें राजपरिवार, पुजारी, मांझी-चालकी प्रतिनिधि, पटेल, नायक-पायक समूह और हजारों स्थानीय स्वयंसेवक मिलकर हिस्सा लेते हैं.
600 साल से ज्यादा पुरानी है यह परंपरा
बस्तर दशहरे का इतिहास कई सदियों पुराना बताया जाता है. कुछ स्थानीय अभिलेखों के अनुसार इसकी शुरुआत राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में हुई थी. कुछ जानकार इसे 13वीं सदी से जोड़ते हैं, जबकि कई अभिलेखों में इसे साल 1408 से मनाए जाने का जिक्र मिलता है. बस्तर लोकसभा सांसद महेश कश्यप ने भी इसे 619 साल पुरानी परंपरा बताया है.
इस साल केंद्र सरकार से भी उत्सव को राष्ट्रीय मंच दिलाने की कोशिश हो रही है. सांसद कश्यप ने केंद्रीय मंत्री से दूरदर्शन और आकाशवाणी पर विशेष कवरेज की मांग की है, ताकि बस्तर की पहचान सिर्फ नक्सल प्रभावित इलाके तक सीमित न रहकर, शांति और संस्कृति से भी जुड़े.
छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए यह उत्सव क्यों खास है
बस्तर दशहरा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आदिवासी पहचान और प्रकृति-पूजा की जीवंत मिसाल है. जो लोग जगदलपुर जाकर इस उत्सव को देखना चाहते हैं, वे अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में रथ यात्रा और नीशा जात्रा जैसी बड़ी रस्मों का हिस्सा बन सकते हैं. स्थानीय प्रशासन के मुताबिक इस साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है.
अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक स्रोतों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. त्योहार से जुड़ी रस्मों, तारीखों और कार्यक्रमों में स्थानीय प्रशासन या मंदिर समिति की घोषणा के अनुसार बदलाव संभव है.
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