अगर हम बात करते हैं भारत के इतिहास कि तो वो बहुत ही शानदार रहा है। भारत के राजाओं ने अपने राज्य को बाहरी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए कई बलिदान दिए हैं। इस त्याग और बलिदान में यहां की रानियां भी किसी से पीछे नहीं रही हैं। यहां के राजा और रानियों कि वीरता की कहानी से हमारे इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।
रजिया सुल्तान
रजिया सुल्तान भारत की पहली महिला शासक थी। रजिया सुल्तान एकमात्र महिला शासक थीं जिन्होंने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया था। उन्होंने देश पर 1236 से 1240 तक शासन किया। वह एक साहसी सुल्तान थी और दिल्ली के सिंहासन पर नियंत्रण और हस्तक्षेप करने वाली पहली मुस्लिम महिला थी, उन्होंने दिल्ली का शासन अपने पिता से उत्तराधिकार मे प्राप्त किया था। रजिया सुल्तान अपने सबसे बड़े भाई और उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद, सुल्तान इल्तुमिश ने अपने राज्य का उत्तराधिकारी रजिया को नामित किया। हालांकि उस समय सुल्तान का यह फैसला उन लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आया, जो राज्य में ऊंचे पदों पर आसीन थे, वे किसी महिला शासक का शासन स्वीकार नहीं करना चाहते थे। जिसके कारण रजिया को सिंहासन के लिए लड़ना पड़ा। राज्य के कुलीन वर्ग ने धोखे से रजिया के भाई रुकनुद्दीन फिरोज को उसके स्थान पर राजा बना दिया, जो बहुत अक्षम और क्रूर शासक साबित हुआ।
फिरोज के राजा बनने के बाद रजिया ने आम लोगों को शासन के खिलाफ लामबंद किया और विद्रोह शुरू कर दिया। इस विद्रोह की अगुवाई रजिया ने खुद की और फिरोज को हरा कर राज्य पर कब्जा कर लिया। कैद में रखे गए फिरोज को बाद में मार डाला गया। हालांकि रजिया का शासन अल्पकालिक था, लेकिन रजिया सुल्तान ने खुद को एक मजबूत और सक्षम नेता के रूप में साबित किया।
अहिल्याबाई होल्करी
अहिल्याबाई का जन्म चौंडी नामक गाँव में हुआ था जो आजकल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के जामखेड में पड़ता है। दस-बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। उनतीस वर्ष की अवस्था में विधवा हो गईं। पति का स्वभाव चंचल और उग्र था। वह सब उन्होंने सहा। फिर जब बयालीस-तैंतालीस वर्ष की थीं, पुत्र मालेराव का देहान्त हो गया। जब अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, दौहित्र नत्थू चल बसा। चार वर्ष पीछे दामाद यशवन्तराव फणसे न रहा और इनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने ससुर मराठा साम्राज्य के महान सूबेदार मल्हार राव होल्कर से सिंहासन प्राप्त किया था। मल्हार राव होल्कर ने अपने शासन के दौरान अहिल्या बाई को बहुत सम्मान दिया, यहां तक कि कुम्हेर की लड़ाई में उनके पति खंडेराव होल्कर के मारे जाने के बाद भी उन्हें सती होने से रोका दिया। अहिल्याबाई अपने ससुर की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठी। सैन्य युद्ध में प्रशिक्षित अहिल्याबाई को मालवा सेना का पूरा समर्थन प्राप्त था। युद्ध के दौरान अहिल्याबाई अपने सैनिकों का नेतृत्व खुद करती थी। अहिल्याबाई को सभी सक्षम भारतीय रानी शासकों में प्रमुखता से गिना जाता है। इंदौर को एक गांव से शहर तक विकसित करने में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। हालांकि, उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण माना जाता है, जिसे सम्राट औरंगजेब के आदेश पर तोड़ दिया गया था।
अहिल्याबाई के सम्बन्ध में दो प्रकार की विचारधाराएँ रही हैं। एक में उनको देवी के अवतार की पदवी दी गई है, दूसरी में उनके अति उत्कृष्ट गुणों के साथ अन्धविश्वासों और रूढ़ियों के प्रति श्रद्धा को भी प्रकट किया है। वह अँधेरे में प्रकाश-किरण के समान थीं, जिसे अँधेरा बार-बार ग्रसने की चेष्टा करता रहा। अपने उत्कृष्ट विचारों एवं नैतिक आचरण के चलते ही समाज में उन्हें देवी का दर्जा मिला।
रानी लक्ष्मीबाई
भारत में जब भी महिलाओं के सशक्तिकरण की बात होती है तो महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा जरूर होती है। रानी लक्ष्मीबाई ना सिर्फ एक महान नाम है बल्कि वह एक आदर्श हैं उन सभी महिलाओं के लिए जो खुद को बहादुर मानती हैं और उनके लिए भी एक आदर्श हैं जो महिलाएं सोचती है कि वह महिलाएं हैं तो कुछ नहीं कर सकती।
झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को इंडियन क्वीन भी कहा जाता है। इन्हें भारत की सबसे प्रसिद्ध महिला शासकों में से एक माना जाता है। उन्होंने 1857 के प्रथम विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह भारतीय रानी अपने पति गंगाधर राव नेवालकर की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठी। वह छोटी उम्र से ही युद्ध में प्रशिक्षित थी और एक कुशल सैन्य नेता भी थी। रानी लक्ष्मी बाई अपने शासनकाल के दौरान अपनी प्रजा का ज्यादा सेवा नहीं कर पाई, क्योंकि वे गद्दी पर बैठने के बाद से ही अपनी सेना के साथ झांसी पर आक्रमण करने के लिए आने वाली विशाल ब्रिटिश सेनाओं के साथ लड़ाई में उलझी रही। इनके द्वारा दिखाई गई वीरता और त्याग के कारण इन्हें भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में अत्यधिक सम्मान दिया जाता है। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थीं।
रानी चेन्नम्मा
कित्तूर चेन्नम्मा आधुनिक कर्नाटक की एक रियासत कित्तूर की रानी थी। उनका जन्म लिंगायत समुदाय में हुआ था और पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह देसाई परिवार के राजा मल्लसर्ज से हुआ था। छोटी उम्र से ही उन्हें तलवारबाजी, तीरंदाजी और घुड़सवारी का प्रशिक्षण मिला था। इन्होंने 1824 में अपने बेटे और अपने पति दोनों को खो दिया, जिसके बाद वे राज्य की गद्दी संभाली और अंग्रेजों के साथ युद्ध शुरू कर दिया।रानी चेन्नम्मा की कहानी लगभग झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह है। इसलिए उनको ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई’ भी कहा जाता है। वह पहली भारतीय शासक थीं जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। भले ही अंग्रेजों की सेना के मुकाबले उनके सैनिकों की संख्या कम थी और उनको गिरफ्तार किया गया लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत का नेतृत्व करने के लिए उनको अब तक याद किया जाता है।
यह भारतीय रानी भी उन पहली महिला शासकों में से एक थी, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी सेना को युद्ध में लीड किया। रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों के साथ शुरुआती युद्ध में जीत हासिल की और अंग्रेजों के दो उच्च अधिकारियों को पकड़ लिया, जिन्हें बाद में अंग्रेजों के साथ हुए समझौते के बाद रिहा कर दिया गया और अंग्रेज वापस चले गए। हालांकि, कुछ समय बाद अंग्रेजों ने एक विशाल सेना के साथ फिर से हमला किया और रानी चिनम्मा को पकड़ लिया। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में रानी चेन्नम्मा ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया, लेकिन वह लंबे समय तक अंग्रेजी सेना का मुकाबला नहीं कर सकी। उन्हें कैद कर बेलहोंगल किले में रखा गया जहां उनकी मौत हो गई। पुणे-बेंगलूरु राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेलगाम के पास कित्तूर का राजमहल तथा अन्य इमारतें गौरवशाली अतीत की याद दिलाने के लिए मौजूद हैं। रानी चेन्नम्मा को कर्नाटक की लोककथाओं में एक नायक के रूप में जाना जाता है।
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