दीपावली के अवसर पर कुम्हारों, छोटे कारीगरों से नहीं लिया जाएगा बाजार शुल्क

कुम्हारों ने भी माना मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार में आया बदलाव

पुश्तैनी कुम्हारी कला व्यवसाय एक बार फिर बना रोजगार का जरिया

रायपुर। दीपावली के अवसर पर कुम्हारों, स्व सहायता समूहों, छोटे कारीगरों से कोई भी कर या शुल्क नहीं लेने और उन्हें पूर्ण सहयोग और समस्त आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश सरकार ने जिला प्रशासन को दिए हैं। इन लोगों द्वारा दीपावली के मौके के लिए विशेष रुप से तैयार की गई सामग्रियों की बिक्री के लिए स्टॉल, दुकानें लगाई जाती हैं। कुम्हार द्वारा दीये, दीप, मूर्तियों, स्व-सहायता समूहों और छोटे कारीगरों द्वारा अनेक सजावटी सामग्री सहित अपने तैयार उत्पादों की बिक्री की जाती है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ग्रामीण क्षेत्र में कारीगरों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने उन्हें प्रोत्साहन देने के उद्दश्य से यह निर्णय लिया।

फुटपाथ पर सामान बेचने वाले रेहड़ी और पटरी विक्रेताओं को इस बार दीपावली पर व्यवस्थित बाजार मुहैया कराया जाएगा। पटरी विक्रेताओं के लिए आय बढ़ाने का बेहतर मौका होगा। दीपावली का पर्व चार नवंबर को है। उससे लगभग एक सप्ताह पहले इन सभी लोगों को दी गई सुविधाओं को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री के द्वारा की घोषणा की मुख्य वजह इन लोगों पर कोई आर्थिक बोझ न पड़े और वे लोग सुविधाजनक रूप से सामग्रियों का विक्रय कर सकें, इसलिए मुख्यमंत्री ने इन लोगों को पूर्ण सहयोग और सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री बघेल ने इसी कड़ी में आम जनता से भी यह अपील की है कि वे दीपावली के मौके पर स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार सामग्रियां क्रय कर उन्हें भी अपनी खुशियों में शामिल करने की पहल करें।

माटी कला बोर्ड का प्रयास

छत्तीसगढ़ शासन ने माटीकला बोर्ड की स्थापना कुम्हारों के लिए किया गया है और कुम्हारों को ही प्रशिक्षित किया जाता है। माटीकला के माध्यम से कुम्भकारों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, अधिकाधिक रोजगार के लिये प्रशिक्षण आदि संचालित करना। परम्परागत एवं प्रशिक्षित शिल्पियों को विपणन सुविधा उपलब्ध कराने के दृष्टि से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार का ज्ञान कराना।

कांग्रेस सरकार आने के बाद से आया बदलाव

इस बार दीपावली को लेकर कुम्हारों के चाक की रफ्तार तेज हो गई है। ग्रामीण अंचल में मिट्टी का बर्तन बनाने वाले कुम्हार दिन-रात काम कर रहे हैं। कुम्हारों को उम्मीद है कि अब उनका पुस्तैनी कारोबार फिर से लौट आएगा। दीपावली पर इस बार लोगों के घर आंगन मिट्टी के दीये से रोशन होंगे। बाजार में भी मिट्टी के दीये बिकने के लिए पहुंच गए हैं। लोगों ने दीयों की खरीदारी भी शुरू कर दी है। गांव में सदियों से पारंपरिक कला उद्योग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में जहां पूरा सहयोग मिलता रहा, वहीं गांव में रोजगार के अवसर भी खूब रहे। इनमें से नगर सहित ग्रामीण क्षेत्र में कुम्हारी कला भी एक रही है, जो समाज के एक बड़े वर्ग कुम्हार जाति के लिए रोजी-रोटी का बड़ा सहारा रहा।

पिछले कुछ वर्षों में आधुनिकता भरी जीवनशैली के दौर में चाइनीज सामानों ने इस कला को बहुत पीछे धकेल दिया था। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार आने के बाद पिछले दो वर्षों से खासा बदलाव आया और एक बार फिर गांव की लुप्त होती इस कला के पटरी पर लौटने के संकेत मिलने लगे हैं। कुम्हारी कला से निर्मित खिलौने, दियाली, सुराही व अन्य मिट्टी के बर्तनों की मांग बढ़ी तो कुम्हारों के चेहरे खिल गए।

रोजगार का जरिया बनेगी पुस्तैनी कला

गांव के कुम्हार समाज के युवाओं का कहना है कि लोगों की बदली सोच से लग रहा है कि हम नव युवकों के लिए हमारा पुश्तैनी कुम्हारी कला व्यवसाय एक बार फिर रोजगार का जरिया बनेगा। सरकार कुछ आर्थिक सहयोग के साथ तकनीकी तौर पर बिजली से चलने वाला चाक तथा मिट्टी खनन की समुचित व्यवस्था मुहैया कराए। गांव के कई लोग दिवाली के लिए दीये बनाने का ऑर्डर दे चुके हैं। इस समय दिन-रात मिट्टी के दीये व खिलौने बनाने का काम चल रहा है।

ईको फ्रेंडली समाग्री

मिट्टी से निर्मित मूर्तियां, दीये व खिलौने पूरी तरह इको फ्रेंडली होते है। इसकी बनावट, रंगाई व पकाने में किसी भी प्रकार का केमिकल प्रयोग नहीं किया जाता है। इको फ्रेंडली दीये पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। कुम्हार दुर्गेश ने बताया कि दो-तीन साल पहले हमारा यह पैतृक व्यवसाय खत्म सा हो गया था लेकिन अब लोग फिर मिट्टी के सामान को प्रमुखता दे रहे हैं। लोग का विदेशी सामानों से मोह भंग हो रहा है।