राजनांदगांव। खैरागढ़ विधायक देवव्रत सिंह के निधन के बाद अब 6 महीने में उपचुनाव कराना होगा। इसका मतलब 4 मार्च से पहले नए विधायक का चुनाव हो जाएगा। सोमवार को सीट खाली होने की सूचना छत्तीसगढ़ मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रीना कंगाले चुनाव आयोग को भेजेंगी। 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में चौथी बार उपचुनाव की स्थिति बन रही है। इससे पहले 2008-13 के बीच चार बार उपचुनाव हुए थे।
छत्तीसगढ़ में अब तक 12 बार विधानसभा उपचुनाव हो चुके हैं। जिसमें कोटा को छोड़ दें तो हर बार सत्ताधारी पार्टी की जीत हुई है। 2006 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के पहले अध्यक्ष पं. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के निधन के बाद कोटा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. रेणु जोगी जीती थीं। तब से लेकर अब तक वे चौथी बार विधायक हैं। बता दें कि 2018 के चुनाव में देवव्रत सिंह ने जनता कांग्रेस (जोगी) के टिकट से चुनाव लड़ा था।
उपचुनाव के जरिए ही विधायक बने थे देवव्रत
इस चुनाव में जनता कांग्रेस के पांच प्रत्याशी जीते थे। इनमें खुद पार्टी के संस्थापक अजीत जोगी, रेणु जोगी, धर्मजीत सिंह, देवव्रत और प्रमोद शर्मा शामिल हैं। जोगी के निधन के बाद जनता कांग्रेस के विधायकों की संख्या चार रह गई थी। हालांकि मरवाही उपचुनाव के दौरान ही देवव्रत और प्रमोद के कांग्रेस में शामिल होने की भी चर्चा थी। 1994 में देवव्रत भी उपचुनाव के जरिए विधायक चुने गए थे। उनकी मां रश्मि देवी सिंह के निधन के बाद चुनाव हुए थे। इस तरह खैरागढ़ में ही तीसरी बार उपचुनाव होंगे।
प्रदेश के पहले दो उपचुनाव सीएम के लिए
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले दो उपचुनाव मुख्यमंत्रियों के लिए हुए थे। दरअसल, पहले दोनों मुख्यमंत्री यानी जोगी और डॉ. रमन सिंह जब मुख्यमंत्री चुने गए, तब वे विधायक नहीं थे। जोगी के लिए तत्कालीन भाजपा विधायक रामदयाल उइके ने मरवाही सीट छोड़ी थी। वहीं जब 2003 में भाजपा की सरकार बनी, तब प्रदीप गांधी ने डॉ. रमन के लिए डोंगरगांव सीट खाली की। हालांकि जीतने के बाद रमन ने अपनी सीट बदल ली और राजनांदगांव से चुनाव लड़े। फिर उसी सीट से तीसरी बार विधायक चुने गए हैं।
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