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छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अपनी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां की परंपराएं पीढ़ियों से समाज को जोड़ने का काम करती हैं। इन्हीं परंपराओं में 75 दिनों तक चलने वाला यह ऐतिहासिक पर्व खास स्थान रखता है। इसमें धार्मिक आस्था, सामूहिक सहभागिता और लोक संस्कृति की झलक मिलती है।

8 अक्टूबर को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को पर्व में शामिल होने का आमंत्रण दिया। इस दौरान पारंपरिक पागा पहनाकर उनका सम्मान किया गया। मुख्यमंत्री ने आमंत्रण के लिए आभार जताया और आयोजन की सफलता की शुभकामनाएं दीं।

मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर दिया जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक परंपराएं छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण से नई पीढ़ी अपनी जड़ों और इतिहास से जुड़ी रह सकती है। उन्होंने जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक आयोजनों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी दी। साथ ही, इस वर्ष के आयोजन की तैयारियों और विभिन्न परंपराओं पर चर्चा की गई। स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है।

75 दिनों तक चलते हैं पारंपरिक धार्मिक आयोजन

इस वर्ष पर्व का शुभारंभ 12 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान से हुआ। इसके बाद निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा और 18 अक्टूबर को बेल पूजा निर्धारित है। वहीं, 23 अक्टूबर को मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा।

इन कार्यक्रमों में बस्तर के विभिन्न समुदाय परंपरागत जिम्मेदारियां निभाते हैं। पूजा-विधानों से लेकर आयोजन की व्यवस्थाओं तक उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इस सामूहिक सहभागिता से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है।

मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ी है परंपरा

इस पर्व की सबसे खास बात इसकी धार्मिक परंपरा है। यहां दशहरा रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना पर केंद्रित रहता है। देवी को बस्तर अंचल की आराध्य शक्ति माना जाता है। इसलिए पूजा-विधान और पारंपरिक अनुष्ठान पूरे आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

ऐतिहासिक मान्यताएं इस परंपरा को चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव से भी जोड़ती हैं। मान्यता के अनुसार, पुरी में भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि मिली थी। इसी परंपरा के कारण यहां रथ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।

मांझी और चालकी समुदाय निभाते हैं अहम भूमिका

आयोजन में मांझी, चालकी, मेम्बर और मेम्बरीन सहित विभिन्न समुदायों की भागीदारी रहती है। रथ निर्माण, धार्मिक अनुष्ठानों और अन्य व्यवस्थाओं में उनकी परंपरागत जिम्मेदारियां होती हैं। ये भूमिकाएं लंबे समय से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं।

इससे विभिन्न समुदायों के बीच सहयोग और सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है। स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को जीवित रखते हुए सांस्कृतिक विरासत को आगे पहुंचाते हैं। यही सामूहिक प्रयास इस आयोजन को विशिष्ट बनाता है।

बस्तर की संस्कृति बनती है पर्यटन का आकर्षण

भव्य रथयात्रा, पारंपरिक पूजा और जनजातीय रीति-रिवाज पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु और पर्यटक इस आयोजन को देखने पहुंचते हैं। इससे बस्तर की लोककला और सांस्कृतिक पहचान को व्यापक परिचय मिलता है।

यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है। इसके माध्यम से स्थानीय परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं। सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और दुनिया तक पहुंचाने में ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


 

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