बस्तर के आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में कुपोषण आज भी उतनी ही गंभीर चुनौती है, जितनी दशकों पहले थी। सरकारी आंकड़े हों या विपक्ष के आरोप, दोनों यह साफ दिखाते हैं कि इस क्षेत्र का बच्चा आज भी पोषण के लिए संघर्ष कर रहा है।

बस्तर में मौजूद सात एनआरसी सेंटरों में 150 से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण की अवस्था में भर्ती हैं। बीते दो वर्षों में करीब 8 हजार बच्चों को भर्ती किया गया, लेकिन इनका सिर्फ 60% ही पूरी तरह स्वस्थ हो पाया। यह आंकड़ा बताता है कि योजनाएं चल तो रही हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन सवालों के घेरे में है।

भाजपा सरकार का दावा है कि उसने आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषण की गुणवत्ता बढ़ाई है। दूसरी ओर, कांग्रेस कहती है कि भाजपा ने अंडा और दूध जैसी प्रभावी योजनाएं बंद कर दी हैं। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच न तो योजनाओं की निगरानी मजबूत हुई और न ही बच्चों की स्थिति में ठोस सुधार हुआ।

स्थानीय अधिकारी बताते हैं कि पोषण योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंच ही नहीं पा रही। जागरूकता और संसाधनों की कमी सबसे बड़ी बाधा है। एक ओर फंड खर्च किए जा रहे हैं, दूसरी ओर बच्चे अब भी गंभीर हालत में अस्पताल पहुंच रहे हैं।

यह समस्या केवल सरकार बदलने से नहीं सुलझेगी, इसके लिए नीति में निरंतरता और ईमानदारी जरूरी है। अगर हर दल अपने कार्यकाल में इसे प्राथमिकता देता, तो शायद आज तस्वीर अलग होती।

बस्तर का बच्चा बार-बार इस सिस्टम की अनदेखी का शिकार हो रहा है। अब समय है कि राजनीति को किनारे रखकर मानवता की दृष्टि से काम किया जाए।