विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक शक्ति व्यवस्था में भारत की भूमिका को लेकर अहम विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत को केवल मध्यम शक्ति कहना उसकी क्षमताओं को सीमित करके देखना है। देश की बड़ी आबादी, आर्थिक आकार और विकास की संभावनाएं उसकी वैश्विक भूमिका को अलग बनाती हैं।
नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के दौरान जयशंकर ने यह बात कही। उन्होंने बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्वतंत्र निर्णय लेने और आपसी सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, देशों को अपने हितों के आधार पर नीतियां बनानी चाहिए।
भारत की विदेश नीति और स्वतंत्र निर्णय
जयशंकर ने ‘मिडिल पावर’ की पारंपरिक परिभाषा पर सवाल उठाया। उन्होंने इसके बजाय ‘पावर इन द मिडिल’ की अवधारणा का उल्लेख किया। उनके अनुसार, भारत की आबादी, अर्थव्यवस्था और विकास क्षमता को देखते हुए उसकी भूमिका व्यापक है।
विदेश मंत्री ने कहा कि देशों को पहले अपने राष्ट्रीय हितों का आकलन करना होगा। इसके बाद वे स्वतंत्र नीतियां तय कर सकते हैं। आपसी समझौते और सहयोग भी इसी प्रक्रिया के आधार पर आगे बढ़ सकते हैं।
वित्तीय प्रतिबंधों और संसाधनों पर जताई चिंता
जयशंकर ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से जुड़े जोखिमों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि वित्तीय प्रणालियों और महत्वपूर्ण संसाधनों पर नियंत्रण का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने अमेरिकी डॉलर और वित्तीय प्रतिबंधों के प्रभाव का उल्लेख किया। उनके अनुसार, आर्थिक परस्पर निर्भरता के दौर में ऐसे जोखिमों को समझना जरूरी है। रणनीतिक संसाधनों तक पहुंच भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित कर सकती है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सहयोग की अहमियत
विदेश मंत्री ने कहा कि आने वाले समय में देशों के बीच प्रतिस्पर्धा उनके योगदान और क्षमताओं पर निर्भर करेगी। देश अपने हितों के अनुरूप समझौते कर सकते हैं।
उन्होंने साझा विकास और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी जोर दिया। आपसी सहयोग से देश अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकते हैं। इससे बदलती वैश्विक व्यवस्था में नए अवसर भी बन सकते हैं।
जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय बदलावों को निराशावादी नजरिए से देखने के खिलाफ भी चेताया। उन्होंने सहयोग और व्यावहारिक समझौतों को आगे बढ़ाने की जरूरत बताई।
ब्लूमबर्ग फोरम में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा
नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद भी मौजूद थीं।
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रूड और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी इस चर्चा में शामिल हुए। जयशंकर की टिप्पणियों में राष्ट्रीय हित, वित्तीय व्यवस्था और वैश्विक सहयोग प्रमुख विषय रहे।
यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को डिजिटल पहचान दिलाने पर जोर