सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने एक विशेष इंटरव्यू में न्यायपालिका की भूमिका, न्यायिक सक्रियता, बुलडोजर कार्रवाई और राजनीतिक दबाव जैसे विषयों पर खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या संस्था में भय पैदा करना नहीं, बल्कि भरोसा और सुरक्षा स्थापित करना है।
बीआर गवई ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का लोकतंत्र संविधान द्वारा निर्धारित विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — इन तीनों स्तंभों के संतुलन पर खड़ा है। यदि कोई स्तंभ निर्धारित सीमाओं से बाहर निकलता है, तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
“सीधे अदालत तक पहुंच का अधिकार — कमजोर लोगों की आवाज”
इंटरव्यू में उन्होंने इस विचार का समर्थन किया कि कई बार गरीबी, सामाजिक असमानता और संसाधनों की कमी के कारण नागरिक अपनी समस्याओं को शासन तक नहीं पहुंचा पाते। ऐसे में यदि न्यायपालिका उन्हें सीधा अदालत में याचिका दाखिल करने की अनुमति देती है, तो यह न्याय सुनिश्चित करने का मजबूत माध्यम है।
उन्होंने इसे “समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय उपलब्ध कराने का संकल्प” बताया।
बुलडोजर एक्शन और राजनीतिक प्रभाव पर तीखी टिप्पणी
राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले बुलडोजर एक्शन और अदालत पर संभावित राजनीतिक प्रभाव के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट कहा —
🔹 न्यायपालिका सत्ता का औजार नहीं
🔹 अदालतें कानून के आधार पर फैसला करती हैं, दबाव के आधार पर नहीं
🔹 न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पारदर्शिता में है, भय में नहीं
पूर्व CJI ने दोहराया कि अदालत का फैसला न्याय की उम्मीद जगाए, डर नहीं पैदा करे — यही राष्ट्र के लिए सर्वोत्तम है।
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