चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का तिब्बत दौरा एक साधारण राजनीतिक यात्रा नहीं बल्कि भारत के लिए गहरी रणनीतिक चुनौती का संकेत है। 20 अगस्त को हुआ यह दौरा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ के बहाने किया गया, लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक मायने कहीं ज्यादा गहरे हैं।
भारत और तिब्बत का संबंध सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर बेहद मजबूत रहा है। चीन ने 1965 में तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र घोषित किया, लेकिन आज तक वहां उसकी पकड़ पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई। 1959 में दलाई लामा भारत आए और यहीं से चीन-भारत संबंधों में स्थायी तनाव शुरू हो गया।
डिफेंस विशेषज्ञों का कहना है कि चीन लगातार जिनपिंग के दौरे को भव्य दिखाकर यह संदेश देना चाहता है कि तिब्बती जनता बीजिंग के साथ है। लेकिन हकीकत में तिब्बत का झुकाव भारत की ओर अधिक है। यही कारण है कि भारत-चीन सीमा विवाद आज भी अधूरा है और समय-समय पर नए विवाद खड़े होते हैं।
दलाई लामा उत्तराधिकारी का प्रश्न इस पूरे विवाद को और जटिल बना देता है। दलाई लामा ने कहा कि उनका उत्तराधिकारी गादेन फोडरंग ट्रस्ट द्वारा चुना जाएगा। लेकिन चीन ने इस विचार को खारिज कर दिया और कहा कि किसी भी नए उत्तराधिकारी को बीजिंग की स्वीकृति जरूरी होगी। यह विवाद धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दखल दोनों से जुड़ा है।
जिनपिंग के दौरे में उनकी सेना से मुलाकात भी शामिल रही। यह कदम भारत के लिए स्पष्ट संकेत है कि सीमा पर दबाव बनाए रखना चीन की प्राथमिकता है। 2020 की गलवान घाटी की झड़प के बाद यह दूसरी बार है जब जिनपिंग ने तिब्बत का दौरा किया है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ब्रह्मपुत्र नदी का जल है। तिब्बत से निकलने वाली यह नदी भारत और बांग्लादेश के करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। चीन का हस्तक्षेप यहां भारत की जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
नतीजतन, जिनपिंग का तिब्बत दौरा केवल सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक नहीं बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। भारत को इन संकेतों को गंभीरता से लेकर अपनी तैयारी हर स्तर पर मजबूत करनी होगी।
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