इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस केस ने केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित न रहते हुए न्यायपालिका और संसद के अधिकार क्षेत्र को लेकर व्यापक संवैधानिक चर्चा को जन्म दिया है।
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ के समक्ष हुई, जहां दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। जस्टिस वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ गठित संसदीय जांच समिति कानूनन असंगत है और न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है।
वहीं केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जब संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तब संयुक्त संसदीय जांच समिति का गठन पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है। उन्होंने समिति को न्यायिक व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि जवाबदेही का हिस्सा बताया।
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में स्पष्ट किया है कि लोकसभा स्पीकर द्वारा एकतरफा रूप से गठित जांच समिति असंवैधानिक है। उनका कहना है कि किसी न्यायाधीश के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति की संयुक्त भूमिका अनिवार्य है।
इस विवाद की पृष्ठभूमि मार्च 2025 से जुड़ी है, जब नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से जले हुए नोट मिलने की खबर सामने आई। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित किया गया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा कराई गई इन-हाउस जांच में उन्हें दुराचार का दोषी पाया गया, जिसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई। इसके आधार पर महाभियोग प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
अगस्त 2025 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बहुदलीय प्रस्ताव स्वीकार कर तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अदालत का आने वाला फैसला न केवल इस मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में न्यायिक जवाबदेही और संसदीय अधिकारों की सीमाओं को भी स्पष्ट करेगा।
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