लगभग 360 दिनों का संघर्ष, किसानों की आहुति और हिंसक झड़प के बाद आखिरकार किसानों की जीत हुई। केंद्र सरकार को आखिर में अन्नदाताओं के सामने झुकना ही पड़ा। लंबे वक्त से संघर्ष कर रहे लाखो किसान अब जीत की खुशी मना रहे हैं। प्रकाश पर्व पर मानों जैसे किसानों को नई उम्मीद मिल गई। उम्मीद इसकी कि उनकी मेहनत का फायदा अब उन्हें ही मिलेगा, ना कि किसी कंपनी या उद्योगपतियों को। उम्मीद इसकी कि अब किसानों के उत्पादन का मूल्य किसान ही तय करेंगे ना कि देश के कॉर्पोरेट घराने। उम्मीद इसकी कि अब किसानों को अपने हिसाब से उत्पाद बेचने की आजादी होगी। केंद्र सरकार के ये काले कानून किसानों की इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर रहे थे और किसान इसी का विरोध कर रहे थे।

मोदी सरकार ने ये तीनों काले कानून तो वापस ले लिए, लेकिन इस फैसले की पीछे की वजह कहीं राजनीति से प्रेरित तो नहीं। ये फैसला पहले भी लिया जा सकता था। तो अभी क्यों लिया गया जब देश के 5 राज्यों में चुनाव होने हैं। यदि हम इस वजह को नजरअंदाज भी कर दें तो भी जब केंद्र को ये फैसला लेना ही था तो इतनी देर क्यों की? क्या केंद्र सरकार किसानों के सब्र की परीक्षा ले रही थी ? या अन्न्दाताओं के संयम को चुनौती दे रही थी? ये फैसला कहीं प्रधानमंत्री ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए तो नहीं लिया?

तो जीवित होते किसान…

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री किसानों को अन्नदाता बता रहे थे। लेकिन जब तक ये आंदोलन चला तब तक भारतीय जनता पार्टी के लिए ये किसान खालिस्तानी और आतंकवादी थे। किसानों की जितनी चिंता पीएम ने अपने भाषण में की, सच में यदि उतनी ही चिंता उन्हें किसानों की होती तो तो आज कई किसान जीवित होते। यदि कानून वापस लेना ही था तो तब क्यों नहीं लिया जब किसान मर रहे थे, सरकार की तानाशाही से संघर्ष कर रहे थे, अपने अधिकारों के लिए चिल्ला रहे थे?

इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था !

वास्तव में ये चिंता किसानों के लिए नहीं बल्कि आने वाले चुनावों के लिए थी। इसकी पुष्टि वो फीडबैक करता है जो खुद भारतीय जनता पार्टी ने यूपी का चुनावी मूड जानने के लिए किया था। असल में तो भाजपा को जमीनी स्तर पर बड़े नुकसान की आशंका थी। जिसके चलते बैकफुट पर आने का फैसला तो सरकार ने पहले ही कर लिया था। बस सही मौके का इंतजार था और चुनावी मौसम से अच्छा मौका और क्या हो सकता था? साथ ही गुरुनानक देव जी का प्रकाश पर्व इनके लिए सोने पर सुहागा साबित हुआ। इसकी वजह ये भी है कि आंदोलन में पंजाब और हरियाणा के लोगों के साथ सिख संगठन के लोग शुरू से ही सक्रिय थे।

सबका ध्यान किसान आंदोलन पर

दूसरी बड़ी वजह ये थी कि किसान आंदोलन केवल पंजाब, हरियाणा, या पश्चिमी राज्यों तक ही सीमित नहीं था। ये आग लगभग पूरे देश में फैल चुकी थी। किसानों के इस आंदोलन के सामने राम मंदिर, तीन तलाक, लव जिहाद के खिलाफ बने कानून हाशिए पर आ गए थे। अब सबका ध्यान किसान आंदोलन पर था। इससे सरकार की छवि पर भी सवाल होने लगे थे। खुद को किसान हितैषी बताने वाली सरकार अब घिरने लगी थी। अब भला चुनाव के समय सरकार रिस्क कैसे लेती? इसलिए सरकार ने पीछे आना ठीक समझा।

छत्तीसगढ़ को भी श्रेय

जहां तक बात है विपक्ष के श्रेय लेने की, तो इसे गलत भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि विपक्ष के नाते तो उन्हें इस आंदोलन को समर्थन देना ही था। कांग्रेस के अलावा केंद्र सरकार की सहयोगी रही शिरोमणि आकाली दल ने भी इस कानून के चलते सत्ता से दूरी बना ली थी और बाद में अलग भी हो गए। इसी तरह अन्य दलों ने भी भाजपा का साथ छोड़ना शुरू कर दिया, जिसने सरकार की चिंता और बढ़ा दी। अब सरकार से अलग हुए विपक्षी दल किसान हित की दृष्टि से एक साथ आने लगे थे। विपक्ष ने इस आंदोलन का खूब समर्थन किया। इसका श्रेय छत्तीसगढ़ को भी जाता है। प्रदेश सरकार ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया और किसानों के हक के लिए साथ लड़े। ना सिर्फ साथ लड़े, बल्कि राकेश टिकैत के छत्तीसगढ़ में हुए आंदोलन में अपनी भागीदारी भी दिखाई।

संसद तय करेगा आंदोलन खत्म होगा या नहीं

मोदी सरकार ने भले ही इस फैसले के पीछे राजनीतिक दाव खेला है, लेकिन किसान भी इतनी जल्दी आंदोलन खत्म करने के मूड में नहीं हैं। अब जब तक ये कानून संसद से वापस नहीं हो जाएगा तब तक किसानों ने डटे रहने का मन बना लिया है।