रायपुर। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के दूसरे दिन पारंपरिक त्यौहार, अनुष्ठान, फसल कटाई और अन्य पारंपरिक विधाओं पर आधारित लोकनृत्य प्रतियोगिता की शुरुआत हुई। इस प्रतियोगिता की शुरुआत उत्तराखंड के झींझीहन्ना लोक नृत्य के साथ हुई। यह पारंपरिक नृत्य थारू समुदाय द्वारा किया जाता है। नई फसल आ जाने के उपलक्ष्य में भादो और क्वांर (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में गांव के प्रत्येक घर-घर जाकर महिलाओं द्वारा यह नृत्य किया जाता है।
क्या है झींझी नृत्य ?
झींझी नृत्य में घड़े को सिर पर रखकर प्रत्येक घर से आटे व चावल का दान लेते हुए और सभी घरों में झींझी खेलने के बाद उस आटे व चावल को इकट्ठा कर झींझी को एक दैवीय रूप मानकर उसे सभी महिलाएं विसर्जन करने के लिए नदी में जाती हैं। इसके बाद उसे विसर्जन कर उस आटे और चावल का पकवान बना कर सभी लोग खाते हैं। ऐसे ही हन्ना का संबंध देखा जाए तो मारिच से है। उत्तराखंड टीम ने दोनों को मिलाकर सामूहिक प्रस्तुति दी।
छत्तीसगढ़ का करमा नृत्य
उसी तरह छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिभागियों ने भी करमा नृत्य की प्रस्तुति दी। गौरतलब है कि करमा नृत्य भादो के महीने में एकादशी तिथि के दिन राजा करम सेन की याद में किया जाता है। कर्मा नृत्य कलमी (करम डाल के पेड़) की पूजा करके आंगन में उस डाली को स्थापित करते हुए करते हैं। उसमें प्राकृति को देवी स्वरूप में स्थापित करते हुए उनकी पूजा अर्चना करते हैं। रात भर करमा नाच करते हुए अप्रत्यक्ष रूप में देवी-देवता की नृत्य के माध्यम से स्तुति की जाती है। इस नृत्य के माध्यम से पर्यावरण को बचाए रखने का संदेश दिया जाता है। ताकि हमारा पर्यावरण यथावत बना रहे। नृत्य के माध्यम से नृत्य दल भावभंगिमा, वेशभूषा, नृत्य की कला को प्रदर्शित करते हुए अत्यंत मनोरम, रमणीय प्रस्तुति देते हैं। इस श्रेणी में तेलांगाना द्वारा गुसाड़ी डिम्सा, झारखंड द्वारा उरांव, राजस्थान गैर घुमरा, जम्मू कश्मीर द्वारा धमाली एवं छत्तीसगढ़ द्वारा गौर सिंग नृत्य की प्रस्तुति की गई।
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