सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार से पराली जलाने के मुद्दे पर सख्त सवाल पूछे हैं।
अदालत ने कहा कि प्रदूषण को रोकने के लिए अब सिर्फ अपील या चेतावनी काफी नहीं होगी। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि क्यों न पराली जलाने वाले किसानों को गिरफ्तार कर कड़ा संदेश दिया जाए।
सीजेआई ने कहा कि किसान समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनकी वजह से हमें भोजन मिलता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि पर्यावरण को नुकसान सहा जाए। अदालत ने सवाल किया कि पंजाब सरकार दंडात्मक कार्रवाई से क्यों बच रही है और अगर सही नीयत से पर्यावरण बचाना है तो कठोर कदम उठाने ही होंगे।
🔹 जैव ईंधन पर जोर
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने सुझाव दिया कि पराली को जलाने के बजाय इसका इस्तेमाल जैव ईंधन के उत्पादन में किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह पांच साल की योजना नहीं होनी चाहिए, बल्कि तुरंत ठोस पहल करनी होगी।
🔹 पंजाब सरकार का तर्क
पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल मेहरा ने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में काफी कमी आई है। आंकड़ों के मुताबिक पहले जहां लगभग 77,000 मामले सामने आते थे, वहीं अब यह घटकर करीब 10,000 रह गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि छोटे किसानों की गिरफ्तारी उनके परिवारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
🔹 अदालत का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ पंजाब ही नहीं, बल्कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को भी अपने-अपने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में खाली पद जल्द भरने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि राज्य सरकारें प्रदूषण नियंत्रण के ठोस उपाय नहीं करतीं, तो कोर्ट स्वयं आदेश जारी करेगा।
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