फिल्म निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने हाल ही में एक खास बातचीत के दौरान सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, ट्रोलिंग संस्कृति और फिल्मों को लेकर बनती त्वरित राय पर अपनी बेबाक राय रखी। सुरेश त्रिवेणी इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि आज फिल्मकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया की प्रतिक्रियाओं को संभालना भी है।
सोशल मीडिया ने कैसे बदला फिल्म इंडस्ट्री का माहौल?
निर्देशक का मानना है कि पहले दर्शकों की प्रतिक्रिया आने में समय लगता था, लेकिन अब कुछ ही सेकंड में राय बन जाती है। सुरेश त्रिवेणी इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि कई बार लोग फिल्म देखे बिना ही उसके बारे में निष्कर्ष निकाल लेते हैं, जिससे अनावश्यक दबाव पैदा होता है।
रिलीज से पहले ही शुरू हो जाता है फैसला
आज ट्रेलर या टीजर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो जाती है। कई बार दर्शकों की शुरुआती प्रतिक्रिया फिल्म की वास्तविक गुणवत्ता से अलग होती है। ऐसे में फिल्मकारों को धैर्य बनाए रखना पड़ता है।
ट्रोलिंग पर क्या बोले सुरेश त्रिवेणी?
ट्रोलिंग के मुद्दे पर सुरेश त्रिवेणी ने कहा कि हर आलोचना को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं होती। उनके अनुसार, रचनात्मक सुझाव और बेवजह की आलोचना में अंतर समझना जरूरी है।
फीडबैक और ट्रोलिंग में है बड़ा फर्क
उन्होंने कहा कि यदि दर्शकों की प्रतिक्रिया फिल्म को बेहतर बनाने में मदद करे तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन केवल नकारात्मकता फैलाने वाली टिप्पणियों को नजरअंदाज करना ही बेहतर विकल्प है।
महिला किरदारों को लेकर क्या है उनकी सोच?
सुरेश त्रिवेणी इंटरव्यू में उन्होंने अपनी फिल्मों के महिला पात्रों पर भी बात की। उनका कहना है कि उनकी कहानियों में महिलाएं सिर्फ सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि कथा के केंद्र में रहती हैं।
मजबूत महिला पात्रों पर रहता है फोकस
निर्देशक का मानना है कि समाज की वास्तविक कहानियों को दिखाने के लिए महिला किरदारों को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करना जरूरी है। यही वजह है कि उनकी फिल्मों में महिला पात्रों की भूमिका हमेशा प्रभावशाली रही है।
कहानी कहने के तरीके पर भी रखी राय
सुरेश त्रिवेणी का मानना है कि दर्शक उन कहानियों से ज्यादा जुड़ते हैं जो वास्तविक जीवन के करीब हों। उन्होंने कहा कि साधारण परिस्थितियों में असाधारण भावनाओं को दिखाना ही अच्छी कहानी की पहचान है।
मनोरंजन के साथ सोचने पर मजबूर करे फिल्म
निर्देशक के मुताबिक किसी फिल्म का उद्देश्य केवल संदेश देना नहीं होना चाहिए। अगर कोई फिल्म दर्शकों को कुछ क्षणों के लिए सोचने पर मजबूर कर दे, तो वह अपने मकसद में सफल मानी जा सकती है।
बदलते दौर में फिल्मकारों के लिए क्या है सबसे बड़ी सीख?
सुरेश त्रिवेणी इंटरव्यू से यह साफ होता है कि डिजिटल युग में फिल्मकारों को सोशल मीडिया की ताकत को समझना होगा। साथ ही उन्हें आलोचना और सराहना के बीच संतुलन बनाकर अपनी रचनात्मकता को बनाए रखना होगा।
निष्कर्ष
सुरेश त्रिवेणी इंटरव्यू में सामने आए विचार आज के फिल्म उद्योग की वास्तविक चुनौतियों को उजागर करते हैं। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बावजूद उनका मानना है कि अंततः दर्शक ही किसी फिल्म की असली सफलता तय करते हैं। रचनात्मक सोच, मजबूत कहानी और धैर्य ही किसी फिल्मकार की सबसे बड़ी ताकत है।
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