छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए गए सबसे प्रभावशाली अभियानों की चर्चा हो और आईपीएस कमलोचन कश्यप का जिक्र न आए, ऐसा संभव नहीं है। बस्तर अंचल में दशकों तक सक्रिय रहे इस जांबाज पुलिस अफसर ने अपनी रणनीति, साहस और जमीनी समझ से नक्सलियों की कमर तोड़ दी। हाल ही में सेवानिवृत्त होने के बावजूद राज्य सरकार ने उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें पुलिस मुख्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) की जिम्मेदारी सौंपी है।
आईपीएस कमलोचन कश्यप बस्तर जिले के एक साधारण से गांव से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव में और स्नातक तक की पढ़ाई जगदलपुर के कॉलेज से पूरी की। वर्ष 1994 में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे डीएसपी बने और यहीं से उनका पुलिस सेवा का सफर शुरू हुआ।
अपने शुरुआती करियर में उन्होंने खरगोन, उज्जैन, रायगढ़ और राजनांदगांव जैसे जिलों में एसडीओपी और सीएसपी के रूप में काम किया। लेकिन उनकी पहचान सबसे अधिक नक्सल प्रभावित इलाकों में की गई पोस्टिंग से बनी। गरियाबंद, बीजापुर, दंतेवाड़ा और राजनांदगांव जैसे संवेदनशील जिलों में उन्होंने लंबे समय तक नक्सल विरोधी अभियानों का नेतृत्व किया। बाद में वे इन्हीं क्षेत्रों में डीआईजी के पद तक पहुंचे और 1 जनवरी 2026 को सेवा से सेवानिवृत्त हुए।
जब बस्तर में नक्सलवाद अपने चरम पर था, उस दौर में कमलोचन कश्यप ने कई निर्णायक अभियानों को अंजाम दिया। दंतेवाड़ा में एसपी रहते हुए 78 मुठभेड़ों में 45 हार्डकोर नक्सलियों को मार गिराया गया। इसके अलावा बीजापुर और राजनांदगांव में भी कई मुठभेड़ों के दौरान 30 से अधिक माओवादी ढेर हुए। उनकी कार्यशैली की पहचान रही—कम शब्दों में स्पष्ट निर्देश, रणनीतिक सोच और पूरी तरह परिणाम पर केंद्रित रहना।
बस्तर के स्थानीय निवासी होने के कारण उन्हें वहां की बोली, संस्कृति और सामाजिक संरचना की गहरी समझ थी। यही वजह रही कि नक्सल इलाकों में उन्हें काम करने में अपेक्षाकृत कम कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस स्थानीय जुड़ाव ने खुफिया तंत्र को मजबूत किया और नक्सलियों के बीच उनके नाम की गहरी दहशत बना दी।
आईपीएस कमलोचन कश्यप को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक (सराहनीय सेवा), राष्ट्रपति पुलिस पदक (वीरता), राष्ट्रपति पुलिस पदक (विशिष्ट सेवा) और केंद्रीय गृहमंत्री दक्षता पदक जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
