छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था किस कदर दम तोड़ रही है। इसकी एक बानगी विशेष रुप से संरक्षित पंडो जनजाति की मौजूदा स्थिति को देखकर पता लग जाती है। स्वास्थ्य मंत्री उसी संभाग से आते हैं जहां पर इस जनजाति को संरक्षित किया गया है। बावजूद इसके आज इस जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ चुका है। इस जनजाति को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र भी कहा जाता है.क्योंकि राष्ट्रपति ने इन्हें गोद लिया था। लेकिन छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति के गोद लिए हुए इन दत्तक पुत्रों की किस्मत में बीमारी और असुविधा से मरना ही लिखा है। क्योंकि प्रदेश के जिस स्वास्थ्य मंत्री को इनकी सुध लेनी थी वो फिलहाल अपनी राजनीति रोटियां सेंकने में तवा गर्म कर रहे हैं। वो बात और है कि उनके तवा को गर्म करने में बेकसूर जनता और पंडो जनजाति के लोग लकड़ियों का काम कर रहे हैं।

बलरामपुर जिले के रामचंद्रपुर में पंडो जनजाति के लोग निवास करते हैं। इस विशेष संरक्षित जनजाति में पिछले 4 महीनों के अंदर 27 लोगों ने दम तोड़ दिया है। डॉक्टरी जांच में ये पाया गया कि इस जनजाति के लोगों में ज्यादातर बच्चे कुपोषण की कमी से जूझ रहे हैं।वहीं महिलाएं एनिमिया की कमी से मौत का ग्रास बनती जा रही है।

स्वास्थ्य मंत्री का संभाग होने के कारण इस जनजाति को काफी सुविधाएं मुहैया कराई जानी थी। सरकार बदली और टीएस बाबा जब स्वास्थ्य मंत्री बने तो ऐसा लगा कि इस जनजाति का भला होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं,हालात ये बन गए हैं कि 28 दिनों में जनजाति से 23 मौत हो गई है। मौजूदा समय में जिस महिला की मौत हुई वो खून की कमी से बीमार पड़ गई थी। लेकिन ना तो उसे वक्त पर इलाज मिल सका और ना ही मंत्री जी की मदद उनके दरवाजे तक आई। अब यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में मौत का आंकड़ा रुकने के बजाए बढ़ता जाएगा। और मंत्री जी सिर्फ रोटियां सेंकने में मशगूल रहेंगे।