राज्य कुपोषण दर में आई 18 प्रतिशत से ज्यादा की कमी
रायपुर। एनएफएसएस डाटा के सर्वे में छत्तीसगढ़ को सुपोषण के मामले में 21 राज्यों में पहला स्थान मिला है। राज्य में बस्तर और सरगुजा संभाग में सबसे बड़ी समस्या कुपोषण की है। बस्तर के नक्सल क्षेत्र में 37.7 प्रतिशत बच्चों के कुपोषित होना राज्य के विकास के दावे को चिढ़ाने जैसा है। अगर छत्तीसगढ़ के विकास की परिकल्पना करते हैं और हमारे राज्य का आने वाला भविष्य 37.7 प्रतिशत बच्चे कुपोषित रहे तो हमारी विकास की अवधारणा अधूरी है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 150वीं जयंती के दिन 2 अक्टूबर 2019 को कुपोषण मुक्ति महाअभियान मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान की शुरुआत की, जिसके बेहतर परिणाम मिले हैं। देश के 21 राज्यों में एनएफएचएस-4 के द्वारा किए गए सुपोषित बच्चो के सर्वे में छत्तीसगढ़ 21 राज्यो में सुपोषित बच्चो के मामले में पहला स्थान मिला है। 2015-16 में एनएफएचएस-4 के डाटा सर्वे में 37.7 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे। 2021 के सर्वे में छत्तीसगढ़ में कुपोषण में 18.86 प्रतिशत की कमी आई है। छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी 20 राज्यों में कुपोषण बढ़ी है और छत्तीसगढ़ में कुपोषण में कमी आई है।
लगाई लंबी छलांग
बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए स्कूलों एवं आंगनबाड़ी में गर्म भोजन और खाद्य सामग्री बच्चों के रूचि के अनुसार उपलब्ध करा रही है। दूध, अंडा, सोयाबीन की बड़ी, दलिया, चना, फल और अन्य प्रकार के प्रोटीन युक्त आहार के साथ-साथ मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान के माध्यम से गर्म भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। आंगनबाड़ी के माध्यम से गर्म भोजन टिफिन के माध्यम से घर तक पहुंचाया जा रहा है। जन जागरुकता के माध्यम से कुपोषण के खिलाफ एक मजबूत रणनीति के साथ लड़ाई लड़ी गई जिसका सुखद परिणाम है कि 3 साल के भीतर छत्तीसगढ़ सुपोषण के मामले में 21 राज्यों में अव्वल नंबर पर पहुंच गया है।
कोरोना काल में मिला आहार
छत्तीसगढ़ में कोरोना संकटकाल के समय भी राज्य सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और किमतानिनों के माध्यम से कुपोषण को लेकर लड़ाइ्र जारी रखी। ऐसे लोगों को जो चिन्हित किए गए थे उन्हेें घर तक पोषण आहार पहुंचाया गया। सरकार की ओर से किए गए प्रयासों से इस दौरा न केवल उनकी मारक क्षमता बनी रही, बल्कि उनके सुपोषण के ग्राफ को बढ़ाने में मदद मिली। कोरोना काल के दौराान आदिवासी इलाकों में इसका प्रभाव कम रहा। आम लोगों के सहयोग के अलावा स्कूली बच्चों को मिड-डे-मिल के रूप में उन्हें सूखा अनाज दिया गया। यह व्यवस्था स्कूली शिक्षकों और ग्रामीणों के माध्यम से चलता रहा।
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